कुछ तो मजबूरियां रही होगी... कल जब बीजेपी के सारे बयानवीर प्रवक्ताओं के होंठ सूख रहे थे तभी राष्ट्रीय प्रवक्ता सैय्यद शाहनवाज़ हुशैन की ये पंक्ति कि “ कुछ तो मजबूरियां रही होंगी वर्ना यूं ही कोई वेवफा नहीं होता ” , में ही सारा कुछ बयां कर गया। जिस पार्टी ने मात्र नौ माह पहले समूचे भारत में अपना परचम लहराया, आखिर ऐसी क्या ख़ता हुई उससे कि मात्र नौ महीने बाद जनता जनार्दन ने उसे दिल्ली विधानसभा के चुनाव में विपक्ष में भी बैठने के काबिल नहीं छोड़ा। दस फरवरी से पहले किसी के ज़ेहन में शायद ही आया होगा कि मात्र दो साल पुरानी आम आदमी पार्टी 70 में 67 सीट जीत जाएगी, 50 फीसद से भी ज्यादा वोट उसके पाले में पड़ेंगी। ये तो लगभग तय माना जा रहा था कि दिल्ली कांग्रेसमुक्त होगी किन्तु भाज़पा की ये दुर्गती होगी इसका अंदाजा तो किसी राजनीतिक प्राणी को भी नहीं था। अब सवाल ये खड़ा होता है कि पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, लोकसभा, फिर महाराषट्र, हरियाणा, झारखंड, और जम्मू-कश...