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Showing posts from June, 2015

ईमी डायरी-3, कालीचरण भैया का मिलना

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एक अंजाना सा शहर, बिलकुल नए चेहरे, एक नई भाषा (हिंग्लिश) और इन सब के बीच गुमनाम सा मैं। लाखों सपने, हजरों ख्वाब और न जानें कितनी ही उम्मीदें मन में लिए मैं अपनी जन्मभूमि से विदा लिया था। एक पल को ये ख्वाब बिखरने लगे थे, मन हिम्मत हारने लगा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था। सिवाय इसके की कोई गलती तो नहीं कर दी अपनी भूमि को त्याग कर।न ऐसे ही ख्यालात में डूबा था। कि एक दिन अचानक मुलाकात हुई कालीचरण भैया से। एक ऐसे बड़े भाई, गार्जियन, दोस्त, या फिर राह दिखाने वाला कोई मार्गदर्शक। इसमें कोई भी शब्द मेरे लिए कालीचरण भैया को दिया जा सकता है। जिसने न सिर्फ मुझे इन अत्यंत ही छोटी और बेकार सी समस्याओं से निजात दिलाया, बल्कि कुछ बड़े, बहुत बड़े ख्वाब दिखाए। न सिर्फ ख्वाब बल्कि उसे पूरा करने का रास्ता भी बतलाया। इन रास्तों में आने वाली हर मुसिबतों से लड़ना सिखाया, जहां भी घबराया, हर लम्हा एक सहारे के रूप में सामने मिले। मेरे जीवन को ईमी से मिले बेहद बेस्किमती उपहार में से एक हैं “कालीचरण भैया”। कॉलेज का 10 वां या 15 वां दिन रहा होगा जब मेरा उनसे पहली दफा मिलना हुआ था। शायद किसी शिक्षक को अपना ...

ईमी डायरी - 2, शंभू तुम तो 'HI' करना भी नहीं जानते !

कॉलेज में मेरा तीसरा दिन था। धीरे-धीरे लोग एक-दूसरे से घुलने-मिलने लगे थें। कुछ लोगों से मेरी भी बातें होने लगी थी। उस दिन भी मैं अपने तय समय से कॉलेज पहुंचा। कुछ मित्र पहले से ही वहां मौजूद थें। मैं अभी अपना बैग रखा ही था कि छाया अपना दायां हाथ बढ़ाकर मुझसे दो बार बोली हाय… हाय शंभू… मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि छाया क्या कह रही है? जब तक कुछ समझ पाता छाया उदास होकर मेरे पीठ पर हौले से मारकर यह बोलते हुए आगे निकल गई कि “शंभू तुम् तो हाय करना भी नहीं जानते”। लो अब मेरे लिए एक और नई मुसिबत, अब ये “हाय” क्या बला है? अब बताइए प्योर ग्रामीण परिवेश में जीने वाला शंभू कहां से जानता कि हाय क्या होता है? हाय बोलने पर हैलो भी कहना होता है? अब सोचिए जरा जो, यह तक नहीं जानता हो कि हाय और हैलो किस चीडियां का नाम है? वह भला उस वक्त छाया को हैलो का रिप्लाय कहां से कर पाता? मैं अपनी पेशानी पर बार-बार जोर देकर यह समझने का प्रयास कर रहा था कि जब छाया मुझसे मिली तब वह मुस्कुरा रही थी, आखिर मुझसे क्या गलती हो गई कि वह जाते वक्त मुझसे नाराज हो गई। इतना कि पीठ पर एक हल्की सी थपकी भी दे गई। उस...

ईमी डायरी-1

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किसी भी चीज के आगे जब पहला शब्द जुट जाता है, तो वह हर व्यक्ति के लिए अनमोल और यादगार बन जाता है। वो हर उस चीज, उस दिन, उस लम्हे को   को सहेज और समेट कर ताउम्र के लिए याद रूपी बक्से में लॉक कर लेना चाहता है ताकि वह कभी भी उससे गुम न हो पाए। ऐसी ही यादों में से एक है, मेरा इन्टरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मीडिया मैनेजमेंट एंड आईटी (IIMMI) का पहला दिन।            मुझे यह कहते हुए कोइ गुरेज नहीं है कि यह दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वांइट था। यह वो दिन था जहां एक देहाती का शहरी जीवन से वास्ता पड़ा था। मेरे अंधकारमय जीवन में दो प्रकाशपुंज इसी दिन मिले थे, जिन्होनें मेरे जीवन की दशा और दिशा बदल दी। 25 अगस्त 2011 की वह सुबह मेरे हर सुबह से बिलकुल जुदा थी। मेरे अंदर का उमंग और उत्साह अपने चरम पर था। आखिर होता भी क्यों न कभी जिसके ख्वाब संजोया करता था, वो आज पूरा होने वाला था।        मैं और राकेश भैया (भैया जी के दोस्त) कॉलेज की टाइमिंग से तीन घंटे पहले ही कमरे से निकल गए। क्योंकि कॉलेज की राह मेरे लि...

आज फिर उनकी याद आई..

मम्मी-पापा आज जब दफ्तर से निकल रहा था तो आप लोगों की कमी मुझे बेहद खल रही थी। पापा आपको याद है , जब मैं किसी काम को करते-करते थक जाता था तो आप किस कदर चिंतित और परेशान हो जाते थे, अपने हांथों से पहले मेरा चेहरा सहलाते थे, फिर एक प्यार भरे लहजे में कहा करते थे “काहे ले कैल्हीं एतना कामा, छोड़ देंथी हल” मां तो उस दिन तब तक नहीं सो पाती थी जब तक मैं चैन से सो नहीं जाता था। आप दोनों के इसी प्यार के कारण एक किसान का बे टा होने के बाद भी आज तक मैं खेती का एक भी गुर नहीं सीख पाया, आज भी बहुत कम फसल के बारे में जानता हूं।              लेकिन आज जब 12 घंटे दफ्तर में बिताने के बाद घर निकल रहा हूं। शरीर का एक-एक अंग दर्द से कराह रहा है। फिर भी मुस्कुरा रहा हूं। आखिर आज सुनाउं भी किसे हाल अपना। कहने को तो आज भी चारदिवारी से घिरे अपने एक कमरे में जाउंगा,पर वहां मां नहीं मिलेगी जो मेरा थका चेहरा देख कर परेशान हो उठेगी, और न ही वो मां के हाथ का वो हल्दी वाला दूध जिसे वो अपने हांथों से पिलाती थी। वहां पापा भी नहीं होंगे जो प्यार स...