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Showing posts from 2017

29 दिसंबर की शाम तो नेता जीते थे पत्रकारिता 27 को ही जीत गई थी

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दी रांची प्रेस क्लब के 2017 के कार्यकारिणी के चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यहां के 884 पत्रकारों ने अगले दो साल के लिए अपने खेवनहार को चुन लिया है। रांची के शुरुआती दिनों में मिलने वाला यह अनुभव मेरे लिए कई लिहाज से खास रहेगा।पूरे दिन सैकड़ों पत्रकारों का कतारबद्घ हो अपनी बारी का इंतजार करते देखना। जहां न कोई संपादक था, न न्यूज एडिटर, न रिपोर्टर और न कोई फोटो जर्नलिस्ट । यहां केवल मतदाता थे। झारखंड जहां पत्राकारिता को लोग पेशे से ज्यादा इज्जत से जोड़ते हैं उसकी राजधानी का यह नजारा अद्भुत था। इस चुनाव के परिणाम की घोषणा भले ही 29 दिसंबर को हुई हो लेकिन पत्रकारिता तो 27 को ही जीत गई थी। इनमें न कोई खास है न आम, सब एक हैं                    इस चुनाव के प्रचार को देखना कॉफी मग में शक्कर के क्यूब को घुलते देखना था। पत्रकार दफ्तर-दर-दफ्तर चक्कर लगा रहे थे। उनका दफ्तर आना, न जानते हुए भी लोगों से हाथ मिलाना, कई दफा गले भी लग जाना। आह ! कितना सुकूनदेह था इस दृश्य को देखना। इससे भी दिलचस्प था व्हट्स ग्रुप पर शब्दों के जादूगर...

लिरिक्स नहीं पब्लिक की डिमांड देख कर गाते हैंः अमित मिश्रा

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ऐ दिल है मुश्किल का गाना मेरे रुह का परिंदा फड़फडाए...सुन-ए-पुकार बुल्लेया... से यूथ के बीच अपनी अलग पहचान बनाने वाले सिंगर अमित मिश्रा रांची आए थे। अपने गाने और लखनवी लटके-झटके  से रांचीआइट्स को तकरीबन दो घंटा तक खूब झुमाए। दो घंटे बाद दस मिनट के लिए मिश्रा जी को हम भी पकड़ लिए। दस मिनट में आठ सवाल दाग दिए। करियर से लेकर पसंद के लिरिक्स तक। सोशल मीडिया से नए अपकमिंग प्रोजेक्ट तक। हमारे सवालों का बिना लाग लपेट के उन्होंने भी जवाब दियाः                       मनमोहन सिंह और शंभू नाथ के सवालों पर मंथन करते अमित मिश्रा                     सवाल- रांची के लोगों के बारे में क्या कहेंगे ? कैसा लगा आपको यहां के लोगों के सामने परफॉर्म करके ? जवाब- रांची बेहद ही खूबसूरत शहर है। यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लगता है। रांची आकर मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता हूं। बेहद ही प्यारा शहर है यह। यहां के लोग अच्छे और सच्चे हैं। ये इस शहर की सबसे बड़ी खासियत है। यहां लोग अच्छी म्युजिक...

तीन सहेलियां

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रविवार का दिन, दोपहर अपने आखिरी पड़ाव पर था। तीन से ज्यादा का समय बीत चुका था। पूस के शाम की सर्द हवा अपने रफ्तार में बह रही थी। इस पल टैगोर हिल पार्क के 340 सीढ़ी उंचे बने चबूतरे पर समय बीताने का अपना ही सुख था। हर उम्र के लोग इस सुख का आनंद ले रहे थे। ज्यादातर यहां से दिखने वाले रांची शहर के मनोरम दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे। कुछ सेल्फी तो कुछ अपने फैमिली फोटोग्राफी में व्यस्त थे। एक-दो जस्ट मैरेड कपल भी थे जो अपनी इस अवस्था को अलग-अलग पोज के साथ जाहिर कर रहे थे। टैगोर हिल पार्क से रांची शहर का नजारा  इसी दौरान वहां तीन सहेलियों का आगमन हुआ। हमउम्र ही थीं, तीनों सामान लंबाई की भी थीं। चबूतरे का एक दो राउंड लगाकर। 10-12 सेल्फियां निकालकर वे वहां के सबसे उंचे पत्थर पर जा बैठीं। वहां जाते ही तीनों अपनी दुनियां में खो गईं। उन्हें इस बात का तनिक भी फिक्र नहीं रहा कि वे एक सार्वजनिक स्थान पर बैठीं हैं जहां उनकी बातें आसपास के लोग भी सुन रहे हैं। इसकी परवाह किए बिना वे बेधड़क अपनी बातें साझा किए जा रहीं थीं। बातें अपने कॉलेज के सुनहरे दिनों की। बातें अपनी पाबंदियों की।...

अमीरों की मतलबपरस्ती ने गीता की दुनिया वीरान कर दी

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घटना बोकारो के बगल मेें बसा चास की है। यहां दबंग के कटर मिल की दरकी हुई दीवार ने 21 नवंबर की दोपहर गरीब गीता की दुनिया उजाड़ दी। अब सुबह वह किसे स्कूल छोड़ने जाएगी। दोपहर आने का किसका राह देखेगी। रात में किसे किस्से सुनाएगी। कोई दुलार से उसे मां भी तो नहीं पुकारेगा। ये सारे गम उसे उस वक्त खाए जा रहे थे। अमीरों की अपनी मतलबपरस्ती ने हमेशा के लिए उस महिाल की गोद सूनी कर दी।मलवे से दबी लक्ष्मी(गीता की दस वर्षीय बेटी) का केवल चेहरा दिख रहा था। एकदम डरावना सा था वह मंजर। वहां आने वाले हर लोग उसे देख कर सहम जा रहे थे। पर मां तो अपनी बेटी की आवाज सुनना चाह रही थी। अभी-अभी तो स्कूल से आई थी उसकी लाडली। सही से कपड़े भी कहां बदली थी। मां शायद अपनी दुलारी के लिए खाना निकाल रही थी। वह कैसे यकीं करे कि इतनी मनन्त  अब उसकी बेटी हमेशा के लिए खामोश हो गई। वह बेसुध होकर उसे तलाशती रही। कभी इस कोने जाती तो कभी उस कोने। पागल सी चिल्लाती...आई जो हामर लक्ष्मी बेटी कहां चली गेले। गिरी दीवार पर डंडे पटकती। मलवे को हटाने की कोशिश करती। उस पर कान लगा बिटिया की सिसकियां सुनना चाहती।  पति की बा...

कतारबद्ध जाती महिलाएं और मेरी हैरानी

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दिन रविवार। दोपहर के 12 बज रहे थे। दफ्तर की मीटिंग के बाद चाय की तलब में नया मोड़ की ओर निकला था। अभी पहला ही मोड़ पहुंचा था कि आंखों को एक न यकीन होने वाला दृश्य दिखा। तकरीबन 17 महीने बीता चुका हूं बोकारो में। यह नजारा बिलकुल नया था। सामान्य सी दिखने वाली सैकड़ों महिलाएं बिलकुल कतारबद्ध होकर चली जा रहीं थी।बदन पर सामान्य सी साड़ी, सलवार, हवाई चप्पल, बालों में भरपूर मात्रा में तेल, हो ठों पे कोई लिप्सटिक नहीं। इस सड़क पर इस प्रकार की इतनी महिलाओं का दिखना मुझे हैरान कर गया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित महिलाएं बाइक की रफ्तार धीमी कर जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, इनकी संख्या उतनी ही तेजी से बढ़ रही थी। ट्रैफिक नियमों का बिना उल्लंघन किए ये आपस में गप्पे मारते चले जा रहीं थीं। अब तक मैं लगभग 500 मीटर की दूरी तय कर चुका था।अब मुझसे रहा नहीं गया। एक बैच लगाए सज्जन से पूछा ये महिलाएं कौन हैं और कहां जा रहीं हैं? उन्होंने मुझे घूरा। मैंने तुरंत अपना परिचय दिया। बाइक की हैंडिल पकड़ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। ये वनवासी महिलाएं हैं। बोकारो के अलग-अलग प्रखंडों से (गोमिया, ललपनिया, क...

लालिमा

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साल 2001, महीना हिन्दी में माघ और अंग्रेजी में फरवरी का था। उस साल की सर्दी अपने आखिरी दिन गिन रही थी। शाम के लगभग सात बज रहे होंगे। दालान(घर के बाहर का एक कमरा) के बाहर दादाजी का बैठका लगा था। अंदर हम भाई-बहन पढ़ाई कम दिनभर की कानाफूसी में मश्गूल थे। इतने में एक मद्धिम आवाज में भर्र-भर्र करती हुई स्कूटर हमारे दरवाजे पर रुकी। हम भाई-बहन दौड़ते हुए कमरे से बाहर आए। पापा पीछे से उतर रहे थे। मनोज दा(अब स्वर्गीय हो गए) इसे एसएम ऑटोमोबाइल, शेखपुरा से ड्राइव कर लाए थे। चटकदार नीले रंग के एलएमएल की व्हेस्पा को देखकर घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दादाजी, हम बच्चे कभी उसके आगे जा कर तो कभी पीछे से उसे देख रहे थे। तब मनोज दा ने बताया था कि ये फिलहाल व्हेस्पा की टॉप मॉडल है। उस समय इसकी कीमत 35 हजार रुपए थी। पापा इससे पहले कभी कोई बाइक नहीं चलाए थे। साइकिल थी उसे चलाकर ही खुश रहते थे। दादाजी एक दिन अचानक बात-बात में बोल दिए थे साला मेरा बेटा होकर कब तक साइकिल से चलेगा, जाओ पसंद की बाइक खरीद लो। रामकिशोर चा (हमारे पड़ोसी) पापाजी को कॉलेज ग्राउंड में ले जाकर कुछ बेसिक च...

देहाती की नजर से बोकारो

झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस नई दिल्ली स्टेशन से 22 घंटे की यात्रा पूरी कर एक स्टेशन पर रुकती है। बाहर झांकने पर प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर पीले रंग का एक बड़ा से चौकोर बोर्ड दिखा। इस पर काले रंग से लिखा था बोकारो स्टील सिटी। यानी मेरा डेस्टिनेशन। स्टेशन परिसर से बाहर निकलते ही एक क्रम में खड़े लाल और सफेद रंग की चिमनियां और उससे हर वक्त निकलने वाले धुएं आपका परिचय उद्योग की इस नगरी से कराते हैं। 1965 में बना सेल ( स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड ) का देश में यह दूसरा सबसे बड़ा प्लांट है ( यहां लगभग 23 हजार से ज्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं ) प्लांट के चहारदिवारी के बगल से गुजरने वाली सड़क से लगभग 10 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद आता है मुख्य शहर। जहां सेल के सिंबॉल वाला नीले कलर का तोरण द्वार अपने आगंतुकों का बोकारो इस्पात नगर में स्वागत करता है। झारखंड के इस शहर में प्रवेश करते ही नजारा बिलकुल बदला - बदला सा दिखता है। यहां की सड़कों पर पटना , दिल्ली या मुंबई की तरह गाड़ियों का रेला नहीं है। लोगों में हॉर्न बजाने की हो़ड़ भी नहीं है। सड़कें पूरी तरीके से खाली है। लोग अपनी मस्ती में ...

रात दो बजे के बाद भी वो आखिरी पन्ना नहीं भेज पाने का अफसोस

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रात के दो बज रहे थे। सिटी सेन्टर के साथ ही उसके सबसे आखिरी कोने मे स्थित मेरा दफ्तर भी बिलकुल वीरान हो चुका था। सारे लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। ऑफिस का पीएनटी नंबर, मेरा मोबाइल और ओमकार भैया (चीफ विजुअलाइजर) के मोबाइल लगातार बज रहे थे। पिछले 30 मिनट से हमदोनों के एक में हाथ मोबाइल और दूसरा हाथ की-बोर्ड पर चल रहा था। 150 किलोमीटर दूर हमारे बॉस दस मिनट में आठ बार मुझे कॉल कर चुके थे। एकदम सामान्य समझाने से शुरू हुई हमारी बातचीत उनके गुस्से तक पहुंच गई थी। हम परेशान थे। बॉस को मुझसे भी ज्यादा फोन आ रहे थे। हमारे सिस्टम को धनबाद से लेकर जयपुर तक के लोग रिमोट पर ले चुके थे। लेकिन शनिवार एडिशन का वह छह नंबर पेज जिसके मास्ट हेड पर लिखा था बेरमो आसपास। हम नहीं छोड़ पाए। हम लाचार थे। मैं और ओम भैया आखिर तक मेहनत करते रहे। डेस्क के दौरान किए गए काम-1 शंभु इस मुश्किल घड़ी में की गई हमारी मेहनत को हम बेकार नहीं जाने देंगे।ओम भैया ने कहा। एक बार और ट्राई करो। यह तीसरी मर्तबा था जब मैं उस पेज का करेक्शन कर रहा था। इस बार थोड़ा गंदा भी किया था। लेकिन सर्वर की हमसे नाराजगी ऐसी कि उसके ...

गर उस रोज कंधे पर उस हाथ का स्पर्श न हुआ होता...

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लगभग छह साल पहले की घटना है। तब मैं दिल्ली के लिए बिलकुल नया था। न वहां की सभ्यता से परिचित था न संस्कृति से और न ही लोगों से। बस दिल में कुछ ख्वाहिशें और उसे पूरा करने की चाहत थी। न उसके आगे का संघर्ष मालूम था न उसकी डगर। घर छोड़ते वक्त पापा ने कहा था बहुत उम्मीदें है तुमसे। कभी निराश मत करना। इन सारे जज्बातों को समेट कर जीटीबी नगर के उस कॉलेज (IIMMI) में दाखिल लिया था। लेकिन शुरुआत में ही इस कदर टूटने लगूंगा इसकी कभी कल्पना नहीं की थी। दिन , सप्ताह और महीना बीत गया। न मेरी समझ में क्लास की बातें आ रहीं थी न उस क्लास के माहौल। टूटने लगा था। हर दिन क्लास के बाद खुद को कोसना शुरू कर दिया था। पापा और भैया दोनों के  फैसले से उलट मैंने इस कोर्स में दाखिला लिया था। वापस आने का कोई ऑप्शन नहीं था।     ऐसे ही एक रोज कैंटिन के बाहर खुद में खोया था। आंखें नम थी। उनसे दो - चार बूंद निकल कर कब के सूख गए थे। तभी मेरे कंधे पर एक हाथ का स्पर्श हुआ। पीछे मुड़ा तो दिलीप पांडेय सर थे। जो पहले दिन से क्लास ले रहे थे और क्लास के 40 बच्चों के साथ मुझे भी एब्जॉर्ब कर रहे थे। सर ने कंधे...

औरत की ममता

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हर रोज की तरह 28 अगस्त की सुबह भी सुषमा दी दरवाजा नॉक कर कमरे में आई. 15*6 के इस गुलाबी रंग के दीवार वाले कमरे में सब कुछ वैसा ही था जैसा वह पिछले 13 महीनों से देखते आ रही थीं. फर्श पर रात के जूठे बर्तन,  दो पानी की बोतल और टेबल पर बेतरतीब तरीके से रखे पुराने अखबार, दो किताबें और चार कलम. दीदी झाड़ू लगा रही थी, जूते से बाहर के जो गर्दे कमरे में आ गए थे, खाने के वो रैपर जो बिखरे थे उसे साफ कर रहीं थी. अचानक उनकी निगाह हल्दी और चूने के उस प्लेट पर गई जिसका पेस्ट मैंने रात में बनाया तो था पर लगया नहीं था. दीदी परेशान निगाहों से मेरी तरफ देखी. उनकी नजर मेरे  दाए हाथ पर रुकी जो अपने आकार से कहीं मोटा था. घबराते हुए पूछी क्या हुआ शंभू भैया ? उनके सवाल में एक अपनापन था. उनके चेहरे पर एक खा़मोश सा डर था. बताने की इच्छा नहीं होने के बाद भी उनकी इस घबराहट और अपनपन के आगे झूठ नहीं बोल सका... बता दिया, एक्सिडेंट हो गया दीदी जिससे हाथ में थोड़ी चोट आई है... ये क्यों नही लगाए.?  हल्दी की ओर इशारा करते हुए उन्होंने पूछा... इससे कुछ होता है क्या? मुझे लगा कहीं और कुछ नया झमेला न...
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डियर सुगंधा, आज पुर्णिमा है. सावन की.  कुछ नया नहीं है. अलग भी नहीं. यह हमेशा से आते रहा है. अभी से 12 घंटे बाद चला भी जाएगा.  अंतर बस इतना है कि आज हर बहन अपने भाई के पास पहुंचने की कोशिश कर रही होंगी. अमूमन तो पहुंच भी गई होंगी. अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध रही होंगी. वह जीवन के रंगों की तरह रंग-बिरंगी होंगी. अलग-अलग डिजाइन भी होंगे उनके. भाइ के ललाट पर रोड़ी का गोल या लंबा टीका भी लगाई होंगी. उनके ऊपर चावल के कुछ दाने भी चिपकाई होंगी. आखिर में स्टील या पीतल की थाली में कपूर के लौ या घी के दीपक से उनकी आरती भी उतारी होंगी. उस परम शक्ति से अपने भाई के लंबी उम्र, कुशक्तियों से रक्षा और बुरी नजर से बचाव की प्रार्थना भी की होंगी. भाई अपनी बहना की ललाट को प्यार से चूम रहे होंगे. कोई गोद में उठा रहे होंगे.कई तो अपनी बहन की राखी वाली सेल्फी सोशल मीडिया पर भी डाल रहे हैं. सुगंधा मैंने भी अपने व्हट्सएप के वॉलपेपर में अपनी और तुम्हारी साथ वाली तस्वीर लगाई है. वही वाली तस्वीर जब तुम दिल्ली खेलने आई थी और हम तुमसे मिलने तुम्हारे होटल आए थे. सावन के पुर्णिमा के आने की घट...

उसे अपने बालों में गजरा पसंद नहीं था

रात के लगभग 10.15 बज रहे होंगें. हर रात की तरह बोकारो का नया मोड़ अभी भी बिलकुल जवान था. जब समूचा बोकारो अपनी एक नींद पूरी कर लेता है. तब भी इस्कापात नगरी का यह कोना पूरी तरह गुलजार रहता है. शायद इसीलिए सिटी सेंटर के बाद सबसे ज्ययादा भीड़ यहीं दिखती है. स्ट्रीट की पीली रोशनी,  बिहार, झारखंड और बंगाल के अलग-अलग जगहों के लिए भागती बड़ी-बड़ी बसें और चाय पर चर्चा करते लोग. लगभग आधी रात तक यहां का यही नजारा होता है. उस रात भी लोग होटल के आगे बिछी चौकी पर अपनी-अपनी बातों में खोये हुए थे. अचानक सब की नजरें होटल के ठीक बगल की मालाकार दूकान पर थम जाती है. माहौल में फुसफुसाहट शुरू हो जाती है. सब के चेहरे पर एक मुस्कान थी कातिल या गुंडों वाली ये आप अपने हिसाब से तय करने के लिए आजाद हैं. सबकी निगाहें उस दूकान में खड़ी एक लड़की और दो लड़के की गतिविधियों को घूर रही थी. लड़की की उम्र यही कोई 22-23 वर्ष रही होगी. लगभग इसी उम्र के दोनों लड़के भी होंगे. ये दोनों जबरदस्ती लड़की के बालों में गजरा लगवा रहे थे. उसे लगाकर चमेली को सूंघने के बहाने कभी लड़की की गर्दन को चूम रहे थे तो कभी उसके बालों को...

एक साल में बोकारो ने मेरी पत्रकारिता की चाहत को पंख दिया है

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31 मई 2016, सेल के बनाए शहर बोकारो से पहली बार मेरा राफ्ता हुआ था. जेठ की दुपहरी में ढ़ेर सारी उम्मीदें और मन में थोड़ी घबराहट के साथ यहां कदम रखा था. पास में कुल जमा 10 महीने का अनुभव था. वह भी डेस्क का. मेन स्ट्रीम से इतर.ख्वाहिश थी पत्रकारिता को उसके सबसे नीचले पायदान से जानने और समझने की. एथिक्स का जो ककहरा पूरे चार सालों में पढ़ा था उसे हर स्तर पर समझना चाहता था. इसीलिए भैयाजी के मना करने और तनख्वाह भी अपने समकक्षों से कम होने के बाद भी दिल्ली को छोड़ बोकारो आना स्वीकार किया था. कभी रिपोर्टिंग नहीं किया था. प्रॉपर्टी टाइम्स के लिए लिखते वक्त किसी से बात भी करनी होती थी तो फोन से ही काम चल जाता था. बिलकुल नया चैलेंज, नए लोग एक ऐसे शहर में जहां मेरा क्या मेरे खानदान में किसी का ताल्लुकात नहीं था. जब दिल्ली से बोकारो के लिए निकल रहा था अच्छे से याद है जब पहली दफा मैं बोकारो समाहरणालय में यहां के डीसी राय महमापत रे से मिलने गया था. नीचे से उपर तक कांप रहा था. डर के मारे मेरी आवाज नहीं निकल रही थी. आज सर से हर मुद्दे पर बेझिझक बात करता हूं. बिना किसी डर के. जिस जिला शिक्षा पदाधि...

मां के नाम एक ख़त...

मेरी प्यारी मां, मां, आपको पता है आज मदर्स डे है.  भला आपको कैसे पता होगा.  आप अपने बेटे की तरह शहर में थोड़े रहती हो जो दिखावे की दुनिया में जीता है. आप तो गांव की शुद्ध और सच्ची दुनिया में रहती हो. मां अब हमारा देश पश्चिमि यानी विदेशी यभ्यता,  कल्चर, संस्कृति को अपना रहा है. इसकी कुछ चीजें अच्छी है मां.  कुछ बेहद ही बुरी. एकदम से भद्दी. अब बोलिए न लोगों को मदर्स डे भी मनाने की जरूरत पड़ गई. क्या एक बेटे को अपनी मां के लिए किसी खास दिन की जरूरत है मां. क्या मां के होने का उत्सव साल में केवल एक दिन मनाया जा सकता है. क्या मां न्यू ईयर की भांति होती है जो 31 दिसंबर की आधी रात से शुरू रोती है 2 जनवरी होते ही समाप्त. मां तो प्रकृति से प्रदत्त वो अनमोल उपहार है जिसकी न किसी से तुलना की जा सकती है और न ही उसे किसी खास दिन में समेटा जा सकता है. मां तो केवल प्यार की जा सकती है. अनंत, असीम प्यार.जितना भी कर लो वो स्नेह कम ही है. इन शहरियों की तरह आपका बेटा भी अब शहरी हो गया है मां.  देखिए न तभी तो मदर्स डे पर ही आपको ये खत लिख रहा. हां मां,  जब हम एक समाज का...

काबिलियत और कामयाबी के बीच की कड़ी होते हैं बॉस

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बॉस. नाम सुनते ही दिल में कई तस्वीरें उभर आती है. जब तक स्टूडेंट लाइफ में रहा कम ही लोगों से उनके बॉस की तारीफ सुना था. बॉस के नाम के आगे लोग खूसठ, खड़ूस, बदमिजाज जैसे विशेषण लगाने के बाद ही आगे कुछ बताते थे. लेकिन मेरी मानें तो (दो साल में जितना समझ पाया हूं) एक प्रोफोशनल इंसान के जीवन में बॉस की वही भूमिका होती है जो एक नवजात के लिए उसकी मां की. खास कर जब आप फ्रेशर हों. बॉस के सपोर्ट के बिना कभी कोई काबिल कामयाब नहीं बन सकता. शायद इसीलिए बॉस को कभी कठोर तो कभी सॉफ्ट होना पड़ता है. यह मेरा अनुभव है जरूरी नहीं मैं सही ही रहूं. शिव खेड़ा और मेरे बीच में थोड़ा पीछे मुस्कुरा रहे शख्स ही लोकेश सर हैं                  13 मई 2015.इसी दिन मेरी मुलाकात मेरे पहले बॉस से हुई थी. उस दौरान मैं मिट्टी के उस लोंदे के समान था जो घड़ा बनने के लिए बिलकुल तैयार था. जरूरत थी उसे एक शेप देने की. लोकेश भारती सर मेरे जीवन के वे कुम्हार हैं जिन्होंने मुझे आकार दिया. कॉलेज के अल्हड़ लाइफ से सीधा लोकेश सर के हवाले कर दिया गया था. तब नवभारत टाइम्स के सप्लीमेंट...

राजेश भैया अब कभी भी मेरी खबर डेस्क हेड के रूप में नहीं पढ़ेंगे

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2 अप्रैल 2016 यही वह दिन था जब राजेश भैया से मेरी पहली बातचीत हुई थी। वे मुझे बोकारो लाना चाहते थे। जब बोकारो भास्कर में मेरी नौकरी पक्की हुई थी तो इन्होंने नीरज से  कहा था देख लेना नीरज मेरी मूंछ नीची नहीं होनी चाहिए। 30 मई 2016 पहली दफा इनसे बोकारो दफ्तर में मिला। लगभाग पापा की उम्र के एक शख्स। क्या कह के पुकारूं भैया (क्योंकि IIMC से हैं) सर(क्योंकि मुझसे अनुभव में 28 साल बड़े हैं)। भैया क्या कहके पुकारुं आपको। जो दिल करे पुकारो यार.                   एक बिंदास इंसान। सज्जनता और सरलता ऐसी कि क्रोधित इंसान भी इन्हें देखकर ठंडा हो जाता है। गुस्सा क्या बला है इन्हें नहीं पता। 11 महीने को दौरान एक दो दफा छोड़ दूं तो कभी इन्हें गुस्से में नहीं देखा। काम की दीवानगी ऐसी कि इतने सीनियर पोस्ट पर आने के बाद भी दो-दो महीने बिना वीकऑफ के काम करते हैं। सिस्टम पर इनकी उंगलिया चलती नहीं दौड़ती है। पेज एडिट करने में कोई सानी नहीं। हिन्दी ऐसी की पेज पर लगी खबर के बीच से गलतियां ढूंढ निकालते हैं।               ...