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Showing posts from January, 2017

मैंने 19K को 52K में तब्दील होते देखा

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तब मैं शायद दूसरी कक्षा में पढ़ता था। क्रिकेट आते ही दादाजी की  रेडियो जिसके एक कोने में संतोष लिखा होता था, चिल्लाना शुरू कर देता था। हालांकि वो हर शाम साढ़े सात बजे से साढ़े दस तक आकाशवाणी और बीबीसी लंदन से कुछ सुनाया करता था। शायद समाचार। क्रिकेट वाले दिन वह दोपहर के दो बजे से ही ऑन हो जाता था। भारत बनाम एक्सस, वाई, जेड मैच शुरू होते ही आसपास के आठ-दस लोग दादाजी के कमरे में पहुंच जाते थे। चाची जी की ड्युटी होती थी हर 20 मिनट पर इनकी खातिरदारी में चाय पहुंचाए। हम भाइयों को मजबूरन उस रेडियो के आगे बैठना होता था(क्योंकि दादाजी कभी भी किसी को आवाज लगा सकते हैं)। हालांकि भैया जी इसमें दिलचस्पी भी लेते थे। उस दिन हमारा खेलना बंद। लाइट आते ही रेडियो बंद। और ब्लैक इन व्हाइट टीवी ऑन। लोगों की निगाहें एक टक टीवी स्क्रीन पर टिक जाती थी। सभी सचिन के बड़े वाले भक्त में शुमार थे। सचिन के आउट होते ही मातम ऐसा छाता जैसे इनका अपना कोई इनसे बिछड़ गया हो। क्रिकेट में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी यहीं से आई थी। इतना भी नहीं कि...

2016: कुछ काम किया ज्यादा प्यार मिला..

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एक और वर्ष हमें अलविदा कह गया. कागज और दिलों में कई यादें छोड़ गया. यादें खट्टी के साथ मीठी भी होती है. जाहिर है इस वर्ष भी रही होगी. मेरी भी है कुछ हरी मिर्च की तरह तीखी तो साथ में गुलाब जामुन सी मीठी भी है. 2016 का मेरा शुरुआती झटका था नवभारत टाइम्स में कांट्रैक्ट का पूरा होना. यहां से निकलने का न मेरा मन था. न मेरे गुरुदेव की इच्छा थी कि शंभु यहां से जाए. लेकिन दोनों के हाथ में कुछ नहीं था. जिनके हाथ में था उन्होंने हाथ खड़े कर दिए. नवभारत टाइम्स में कभी लगा ही नहीं कि यह मेरी पहली नौकरी है. लोकेश सर एक बॉस कम बड़े भाई ज्यादा बन गए थे. जितना परेशान मैंने उन्हें किया शायद ही किसी ने किया होगा. गुस्सा भी आता था उन्हें लेकिन केवल प्यार से समझाते थे. राजेश सर, किस्मत से ही ऐसे बॉस नसीब होते हैं. चाहे उनके समझाने का तरीका हो या डाटने का बिलकुल ही अलहदा था. प्रिय सर की बात ही क्या करूं. सपोर्ट सिस्टम हैं ये मेरे (हां अभी भी). अनुराग भैया के हाथ में तो खैर मेरी कमांड ही  है. एक झटके में मैं इन सबसे अलग कर दिया गया.. अभी 2016 शुरू होने में कुछ दिन बाकी ही था कि रंजीत सर लाइव इंडि...