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Showing posts from September, 2021

नालियों में टूटती सांसे और नींद में शहर की सरकार

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झारखंड की राजधानी में दो किस्म की सरकारें निवास करती हैं। एक राज्य भर की सरकार। दूसरी शहर की सरकार। अब जरा यहां जनप्रतिनिधियों की संख्या गिन लीजिए। वार्ड स्तर पर पार्षद, 53 वार्ड की नेता मेयर, इनसे थोड़े से नीचे विधायक, 7 विधायक के बराबर सांसद और 81 विधायक स्तर के सीएम तो राज्य भर की जनता के प्रतिनिधि हैं ही। घटना के बाद अक्सर घटना स्थल पर नेताओं की भीड़ जमा होती हैं। 15 घंटे बाद पंडरा में घर से दो किमी दूरी की यात्रा कर सांसद संजय सेठ और विधायक सीपी सिंह भी पहुंचे।  जिस शहर में इतने स्तर के जनप्रतिनिधि रहते हों। वहां की नालियों में हर वर्ष जानें कुहक-कुहक दफन होती हों। ऐसे शहर और इस शहर के मोहल्ला छाप (लेवल) अधिकारी को क्या कहेंगे आप। ये अधिकारी करोड़ो के फंड को डकारते हैं और नालियों के नाम पर बहा देते हैं। डकारना या बहा देना आप अपनी सुविधा के हिसाब से तय कर लीजिए। बाकी मेयर और नगर आयुक्त में इस बात की लड़ाई जारी है कि हम बेहतर की तुम बेहतर।  ये तस्वीर पिछले साल की है।जब कोकर के खोरहा टोली के खुले नाले में एक युवक सबके सामने बह गया था।   आंकड़ों पर आए उससे पहले घटना समझ ...

अदना ही सही ईमानदार रहिए

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I Will Take You In Court.. वो पूरी तरह परेशान थे। तब शायद वो ये समझने की अवस्था में भी नहीं रहे होंगे। क्या बोल रहे हैं? किसे बोल रहे हैं? उनके यह बोल भर देने  से क्या हो जाएगा?  उन्होंने सोचा होगा अदना सा ही तो है। डर जाएगा। अपनी दिशा को बदल लेगा। हर कोई डर जाता है कोर्ट के नाम से। लेकिन वह डिगा नहीं। उसके पास सवाल थे। वहा जवाब मांगता रहा। ऐसा पहली मर्तबा नहीं हुआ था। उनके सख्त लहजे से दिमाग में सहसा तीन साल पुराना किस्सा कुलांचे मारने लगा।  किस्सा सेल के शहर का है। साहब झारखंड लोक सेवा आयोग के अधिकारी थे। शहर की नली से लेकर गली और सड़क से लेकर पार्क को चकाचक रखने का जिम्मा उनके माथे था। एकछत्र राज था उनका। एकदम भौकाल टाइट टाइप। जिससे जो चाहे करा लेते थे। शहर के राजा के सचिव वाला जलवा था उनके पास। कोई उनकी बातों को उनके हिसाब से बस स्वीकार न करे। गजबे भड़कते थे। एक दिन पड़ गए उनके पाले में। जो मन में आया बोलते चले गए। जनाब यहां तक बोल दिए कि पास में होते तब कपार फोड़ देता। सामने वाला बस आहिस्ते से अपने सवाल पर उनका पक्ष लेकर हौले से थैंक यू बोला। मोबाइल के स्क्रीन पर लाल वाल...

लुगाई... कमाई.... जवानी और 35 बरस की जुदाई

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कहानी के असल मुद्दे पर आएं... उससे पहले भोजपुरी और अवधी में लोकप्रिय इस गीत की इस 4 पंक्ति का आनंद  लीजिए...  गोरिया नैहर में सपना सजावत रहे एक बरस एक दिनमां बितावत रहे जहिया गौना कें दिनवा बतवली सखी वही दिनवा से हरदी लगावत रहे आइल जाइय के लेले टिकसवा पिया गिरल बिजुली करेजवा पर फाटल हिया लोर भरके मनौती मनावत रहे रेलिया बैरन रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे... अंग्रेजीदां लोग से माफी के साथ। उनको इस गीत के भाव को समझने के लिए अपनी पेशानी पर ज्यादा जोर देना पड़ सकता है। अब आते हैं असल मुद्दे पर। 3 सितंबर की दोपहर। झारखंड के पंचम विधानसभा के मानसून सत्र का पहला दिन। इसकी गहमागहमी के बीच CM सचिवालय में आकर्षण का केंद्र 70 साल के एक बुजुर्ग थे। नाम-फुचा महली।   फुचा महली झारखंड के गुमला जिले के विशुनपुर प्रखंड के रहने वाले हैं।  चेहरे पर झुर्रियां...डबडबाइ आंखें और कमर से लाचार... । फुचा महली  सही से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। आवाज भी शब्द के साथ नहीं दे रहे थे। ये सिर्फ फुचा नहीं थे। प्रवासियों की मजबूरी की एक पूरी किताब थे। अगर 'प्रवासी' का मायना समझना चाहते हैं त...

नाम के आगे उपसर्ग लगातीं सरकारें और उस पर हाईकोर्ट की ये टिप्पणी

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भूख से मौत मामले की एक सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2021 को एक सख्त टिप्पणी की है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ रविरंजन और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की कोर्ट ने कहा-""झारखंड में आज भी यहां के लोगों को जंगली की तरह ट्रीट किया जाता है। बिरहोर समाज के लोग पत्ता खाने को मजबूर हैं। गैस चूल्हा, शौचालय और स्वच्छ पानी तक की भी कोई सुविधा नहीं मिल पा रही है। जबकि उनके ही जंगल से हम खनिज पदार्थ निकालते हैं। लेकिन उनका विकास नहीं हो पा रहा है।'' झारखंड हाईकोर्ट ने भूख से हुई मौत का स्वत: संज्ञान लिया है। अदलात ने कहा-"यह शर्म की बात है कि अभी भी कई गांव के लोग लकड़ी बेचकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में यह राज्य सरकार के लिए सोचने की जरूरत है कि योजनाएं धरातल पर पहुंचे। कोर्ट ने कहा कि क्या राज्य सरकार गांव में चिकित्सा सुविधा, स्कूल, शुद्ध पीने का पानी, रसोई गैस जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं उपलब्ध करा सकती है।'' आज से 5 साल पहले ऐसी ही एक स्टोरी की तालाश में मैं बोकारो के गोमिया, ललपनिया के गांवों में घूमा था। वह गांव पूरी तरह बिरहोर जनजाति का था। गांव...