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Showing posts from 2019

झारखंड में कराहता विपक्ष

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रांची की चाय दुकानों पर इन दिनों दो मुद्दों पर चर्चा गरम है। पहला शहर में चुनाव आचार संहिता लागू करने की और दूसरा विपक्ष में बीजेपी को वाक ओवर देने की आपाधापी।  लोगों में इस बात पर दाव लगाया जा रहा कि राज्य में आचार संहित छठ बाद लागू होया या मुख्यमंत्री की जोहार जन आशीर्वाद यात्रा की समाप्ति के बाद। हर किसी के पास अपने-अपने तर्क हैं। इन सबके बीच आम जनमानस के मन में डर की एक महीन लकीर भी है। अगर ऐसा हो गया तब वैसा होगा और ये लौट आए तब वो कर देंगे। ये हो गई चाय पर चर्चा वाली बात।  अब आइए मुद्दे पर लौटते हैं। बात बीते रविवार की है। दोपहर एक बजे सीपीएआई(एम) की प्रेसवार्ता थी। मेन रोड स्थित पार्टी कार्यालय में। इसे पार्टी की वरिष्ठ नेता वृंदा करात संबोधित करने वाली थी। 1.15 बजे तक चार पत्रकार पहुंचे थे। दो रिपोर्टर, दो कैमरा पर्सन। दोनों एक ही संस्थान से निकलने वाले हिन्दी और अंग्रेजी अखबार के थे। वर्षों पुराने मकान में बने उस दफ्तर में सन्नाटा कुछ यूं पसरा था कि वहां कि एक पालतू बिल्ली कि आवाज भी कानों में चुभ रही थी।  20 मिनट के अंतराल में पार्टी के चार लोग उस ...

राष्ट्रवादी पार्टी में लाल बिंदी वाली वो नेत्री...

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सुषमा जी नहीं रहीं। यह यकीन कर पाना उतना ही कठिन है जितना दो विधान दो निशान जी रहे लोगों को यह स्वीकार कर पाना कि अनुच्छेद 370 अब इतिहास हो गया है। चौड़े पाड़े वाली साड़ी, माथे पर सिन्दूर और ललाट पर बड़ी सी लाल बिंदी वाली वह नेत्री नहीं दिखेंगी। देश के सबसे बड़े पंचायत में गूंजने वाला वह कर्णप्रिय आवाज हमेशा के लिए शांत हो गया। कितना मुश्किल है न इसे यकीन कर पाना। मैम जब आप आखिरी बार यूएन में संबोधित कर रही थी तब लग रहा था कि हमारे गांव के बीच की ही कोई चाची, काकी, ताई दीदी डायस से पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दे रहीं हों। आपने यूनाइटेड नेशंस को भी उसी शालीनता से फटकार लगाई थी। दुनिया के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म पर भी आपने अपना वही लिबास धारण किया था जो आप देश के सबसे छोटी जगह की रैली में पहनती हैं।                                       एक बार मेरी एक दोस्त से इस बात पर बहस हो गई थी कि बिंदी तो फेमनिज्म की निशनी है। अक्सरहां उन्हीं शहरी महिलाओं को बड़ी बिंदी में देखा जाता ...

जैक की मशीन पर कपड़ों के संग सपने बुनती महिलाएं...

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पति भी हैं। अभी घर पर बैठे रहते हैं। पहले कमाते थे। फिलहाल कुछ काम नहीं है। अपने खर्चे से ही घर चला रही हूं। दो बच्चे है।बेटा संत जेवियर्स (शहर का एक प्रतिष्ठित कॉलेज) में पढ़ रहा है। बेटी को उर्सुलाईन हाई स्कूल में पढ़ा रही हूं। पहले मिड डे मिल में काम करती थी। कुछ महीने से ये काम कर रही हूं।   जैक की सफेद और हाई टेक सिलाई मशीन पर उंगलियां फेरते 50 वर्षीय सुनीता तिर्की एक सांस में इतना कुछ कह जाती हैं। सुनीता सखी मंडल की उस मंडली का हिस्सा हैं जो गांव की दहलीज को लांघ  कामयाबी की एक नई इबारत लिख रही हैं। इसी मंडली की सदस्या हैं बैजयंती कुमारी। कहती हैं कि बच्चों को शिक्षक बनाना है। लेकिन यह केवल पति के पैसे से कहां संभव था। उनके पैसे से तो घर का ही खर्च सही से चल जाए यही बहुत है। अब मैं भी उन्हें सहयोग कर देती हूं। प्रशिक्षण सह प्रोडक्शन केंद्र में काम करतीं महिलाएं। ओटीसी ग्राउंड स्थित पंचायती राज भवन के दूसरे माले स्थित पीली दीवार और सफेद रंग की सीलिंग के नीचे सुनीता और बैजयंती  की तरह तकरीबन पचासों महिलाएं अपने काम में तल्लीन थी। कोई कपड़े में बटन के ल...