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Showing posts from 2015

लौट आये लालू

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लौट आये लालू कभी देश की राजनीति में किंगमेकर के नाम से जाने जाने वाले लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक नैय्या लगभग अपना किनारा तलाश चुकी थी। जब तक रहेगा समोशे में आलू तब तक रहेगा बिहार में लालू का जुमला गाने वाले लालू के बारे में कहा जाने लगा था कि अब उनकी लालटेन बुझ चुकी है। लेकिन एक बार फिर उनका सिक्का बिहार की राजनीति की राजनीति में चला और ऐसा जला की उनके लालटेन के लौ ने 2014 लोकसभा चुनाव से ही अश्वमेध के घोड़ा दौड़ा रही बीजेपी(इसमें मैं दिल्ली चुनाव को मैं शामिल नहीं कर रहा) को चारो खाने चित्त कर दिया । दिलचस्प यह रहा कि लालू के इस विजय रथ(80 सीट) में सारथी की भूमिका एक बार फिर उनके छोटे भाई नीतीश कुमार(71 सीट) ने निभाया। कभी जंगल राज की की दुहाई देकर बड़े भाई से मोह भंग कर लालू और राबड़ी के साम्राज्य को बीजेपी के साथ मिलकर नस्तोनाबूत करने वाले नीतीश एक बार फिर से जंगल राज के साम्रज्य के किले को खड़ा कर दिया(हालांकि उसकी मजबूती को लेकर सभी के जेहन में शक है) हालांकि नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के सिरमौर बन जाएंगे लेकिन इस क्रम में किसी को सबसे ज्यादा क्षति पहुंची है तो वो श्रीम...

कौन दिशा में लेकर चल हो बिहारी भैया..

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ऐसा बचपन से सुनते आ रहा हूं कि एक बिहारी के पास बैठ जाइए तो वो आपको पूरे राज्य की राजनीति के हालात स्पष्ट कर देगा, इनकी संख्या जैसे ही दो हुई पूरे देश की राजनीति का सूरत-ए-हाल आपके सामने पेश कर देंगे और गलती से इनकी तिकड़ी बन गई तो समझ जाइए का पाकिस्तान और का चीन अव का नेपाल अमेरिका और जापान की सत्ता के गलियारे में होने वाली उठापटक को आपके सामने उठा के पटक देगा। लेकिन जारी विधानसभा चुनाव में राजनीति के इन महारथियों को ऐसा सांप सूंघा है कि अब गर गलती से इनके सामने पूछ दीजिए कि का हो किसकी सरकार बना रहे हो? बेचारे बिलकुल अपने ट्रेड मार्क स्टाइल में हांथ जोड़कर मासूम सा चेहरा बनाकर भाइ अबकी तो 8 नवंबर को ही पता चल पाएगा। अब जरा सोचिए राजनीति के इन पंडितों का यह हाल तब है जब 243 विधानसभा में 131, 38 जिलों में 22 और लगभग 55 फीसदी मतदाताओं ने अपने मत को दान कर चुके हैं।     सोशल मीडिया पर जाइए तो हर पार्टी के झंडाबरदार अपने-अपने पार्टी का झंडा पहिले से ही बुलंद किए हुए हैं। अरे इतना तो छोड़िए ई लोग तो मुख्यमंत्री से कवीना मंत्री तक के नाम का निर्धारण कर चुके हैं। न्यूज चैन...

गुरू बिन ज्ञान कहां रे

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                                       गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु:गुरूदेवो महेश्वर:                                        गुरू: साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरूवेनम: गुरू एक ऐसा शब्द जिसे सुनते हैं शीष सम्मान से झुक जाता है, एक ऐसा प्रकाशपूंज जो जीवन के अंधकारमय गलियों में अपने प्रकाश से प्रकाशित कर दे,  गुरू एक ऐसा शब्द जो जीवन की अज्ञनता रूपी झोली को अपने ज्ञान रूपी धन से भर देते हैं, गुरू जो हमें सन्नमार्ग पर चलने की राह दिखाते हैं, गुरू जो हमें जीवन जीने का गुर सिखाते हैं, ऐसी न जाने कई कला हैं जो हम गुरू से सीखते हैं। गुरू के बिना इस जीवन की कल्पना कोरी है।        ...

आखिर तुम्हे जाना था...

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अल्लाह के प्यारे याकूब आखिर तुम्हें जाना है ये तो टाडा कि अदालत ने ही मुकर्र कर दिया था। लेकिन गर तुम यूं ही चले जाते जैसे कसाब गया तो उनका खाना कहां हजम हो पाता जिन्हें मुर्दों पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने की फितरत है, यह तमाशा कहां लगता जो कल की पूरी रात लगी, ये वैचारिक गालियां कहां पढ़ने को मिलता जो पिछले एक सप्ताह से तुम्हारे तथाकथित कुछ समर्थकों ने शोशल मीडिया पर फैला रखी थी, और हमारे गृह मंत्री की मानें तो भारत का सुप्रीम कोर्ट विश्व का पहला सुप्रीम कोर्ट कैसे बनता किसी की मर्शी पिटीशन पर रात के दो बजे सुनवाई करने वाला। ये बात दीगर है कि तुमने यह मान लिया था कि अब तुम्हें जाने से कोई नहीं रोक सकता।     लेकिन जरा सोचो तुम बच भी जाते तो क्या चैन से सो पाते, क्या वे आत्माएं तुम्हें सुकून से जीने देती जिसकी असामयिक और पीड़ादायक मौत तुम्हारी वजह से हुई, क्या तुम चाह कर भी उस मां के आंचल में खुशियां वापस ला पाते जिसकी गोद तुमने सूनी कर दी, क्या उस औरत का सुहाग लौटा पाते जिसे तुमने उजाड़ दिए थे, क्या उस बूढ़े बाप का सहारा लौटा पाते जिसके बुढ़ापे की लाठी तुमने छीन ल...

ईमी डायरी-3, कालीचरण भैया का मिलना

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एक अंजाना सा शहर, बिलकुल नए चेहरे, एक नई भाषा (हिंग्लिश) और इन सब के बीच गुमनाम सा मैं। लाखों सपने, हजरों ख्वाब और न जानें कितनी ही उम्मीदें मन में लिए मैं अपनी जन्मभूमि से विदा लिया था। एक पल को ये ख्वाब बिखरने लगे थे, मन हिम्मत हारने लगा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था। सिवाय इसके की कोई गलती तो नहीं कर दी अपनी भूमि को त्याग कर।न ऐसे ही ख्यालात में डूबा था। कि एक दिन अचानक मुलाकात हुई कालीचरण भैया से। एक ऐसे बड़े भाई, गार्जियन, दोस्त, या फिर राह दिखाने वाला कोई मार्गदर्शक। इसमें कोई भी शब्द मेरे लिए कालीचरण भैया को दिया जा सकता है। जिसने न सिर्फ मुझे इन अत्यंत ही छोटी और बेकार सी समस्याओं से निजात दिलाया, बल्कि कुछ बड़े, बहुत बड़े ख्वाब दिखाए। न सिर्फ ख्वाब बल्कि उसे पूरा करने का रास्ता भी बतलाया। इन रास्तों में आने वाली हर मुसिबतों से लड़ना सिखाया, जहां भी घबराया, हर लम्हा एक सहारे के रूप में सामने मिले। मेरे जीवन को ईमी से मिले बेहद बेस्किमती उपहार में से एक हैं “कालीचरण भैया”। कॉलेज का 10 वां या 15 वां दिन रहा होगा जब मेरा उनसे पहली दफा मिलना हुआ था। शायद किसी शिक्षक को अपना ...

ईमी डायरी - 2, शंभू तुम तो 'HI' करना भी नहीं जानते !

कॉलेज में मेरा तीसरा दिन था। धीरे-धीरे लोग एक-दूसरे से घुलने-मिलने लगे थें। कुछ लोगों से मेरी भी बातें होने लगी थी। उस दिन भी मैं अपने तय समय से कॉलेज पहुंचा। कुछ मित्र पहले से ही वहां मौजूद थें। मैं अभी अपना बैग रखा ही था कि छाया अपना दायां हाथ बढ़ाकर मुझसे दो बार बोली हाय… हाय शंभू… मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि छाया क्या कह रही है? जब तक कुछ समझ पाता छाया उदास होकर मेरे पीठ पर हौले से मारकर यह बोलते हुए आगे निकल गई कि “शंभू तुम् तो हाय करना भी नहीं जानते”। लो अब मेरे लिए एक और नई मुसिबत, अब ये “हाय” क्या बला है? अब बताइए प्योर ग्रामीण परिवेश में जीने वाला शंभू कहां से जानता कि हाय क्या होता है? हाय बोलने पर हैलो भी कहना होता है? अब सोचिए जरा जो, यह तक नहीं जानता हो कि हाय और हैलो किस चीडियां का नाम है? वह भला उस वक्त छाया को हैलो का रिप्लाय कहां से कर पाता? मैं अपनी पेशानी पर बार-बार जोर देकर यह समझने का प्रयास कर रहा था कि जब छाया मुझसे मिली तब वह मुस्कुरा रही थी, आखिर मुझसे क्या गलती हो गई कि वह जाते वक्त मुझसे नाराज हो गई। इतना कि पीठ पर एक हल्की सी थपकी भी दे गई। उस...

ईमी डायरी-1

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किसी भी चीज के आगे जब पहला शब्द जुट जाता है, तो वह हर व्यक्ति के लिए अनमोल और यादगार बन जाता है। वो हर उस चीज, उस दिन, उस लम्हे को   को सहेज और समेट कर ताउम्र के लिए याद रूपी बक्से में लॉक कर लेना चाहता है ताकि वह कभी भी उससे गुम न हो पाए। ऐसी ही यादों में से एक है, मेरा इन्टरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मीडिया मैनेजमेंट एंड आईटी (IIMMI) का पहला दिन।            मुझे यह कहते हुए कोइ गुरेज नहीं है कि यह दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वांइट था। यह वो दिन था जहां एक देहाती का शहरी जीवन से वास्ता पड़ा था। मेरे अंधकारमय जीवन में दो प्रकाशपुंज इसी दिन मिले थे, जिन्होनें मेरे जीवन की दशा और दिशा बदल दी। 25 अगस्त 2011 की वह सुबह मेरे हर सुबह से बिलकुल जुदा थी। मेरे अंदर का उमंग और उत्साह अपने चरम पर था। आखिर होता भी क्यों न कभी जिसके ख्वाब संजोया करता था, वो आज पूरा होने वाला था।        मैं और राकेश भैया (भैया जी के दोस्त) कॉलेज की टाइमिंग से तीन घंटे पहले ही कमरे से निकल गए। क्योंकि कॉलेज की राह मेरे लि...