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Showing posts from November, 2023

8 प्वाइंट में समझिए विशेष राज्य का A2Z

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पिछले दो लोकसभा चुनावों की तरह 2024 चुनाव से पहले बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग सिर उठाने लगा है। बिहार में जातीय गणना की रिपोर्ट जारी होने और इसके आधार पर आरक्षण का दायरा बढ़ाने के बाद अब सीएम नीतीश कुमार इस मुद्दे पर केंद्र की मोदी सरकार को घेरने की तैयारी में हैं। उन्होंने ऐलान किया है कि विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिला तो राज्य भर में आंदोलन करेंगे।  ऐसे में सवाल है कि विशेष राज्य का दर्जा होता क्या है? इसके मिल जाने से क्या लाभ मिलेगा? क्या बिहार को ये दर्जा मिल पाना संभव है या ये बस एक चुनावी मुद्दा भर है। 8 पॉइंट में समझिए विशेष राज्य का दर्जा से जुड़े हर सवाल के जवाब... 1. विशेष राज्य का दर्जा क्या है और कैसे मिलता है ? बिहार लोक वित्त और नीति संस्था के एसोसिएट प्रोफेसर और अर्थशास्त्री सुधांशु कुमार बताते हैं कि संविधान में विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रावधान नहीं है। इसकी शुरुआत 5वें केंद्रीय वित्त आयोग की अनुशंसा से हुई । इनमें वे राज्य थे, जो अन्य राज्यों की तुलना में भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक संसाधनों के लिहाज से पिछड़े थे। नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल ने पहाड़, ...

भीम संसद या भीड़ तंत्र

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पटना के वेटनरी कॉलेज ग्राउंड में जेडीयू की तरफ से संविधान दिवस के दिन भीम संसद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम ऐतिहासिक रहा। भीड़ अप्रत्याशित रूप से जुटी। वेटनरी कॉलेज में आज तक इस तरह की भीड़ जमा नहीं हुई थी। ये बात सीएम नीतीश कुमार भी मान लिए। कार्यक्रम को बेल डेकॉर किया गया था ये बात उस रास्ते से गुजरने वाला हर राहगीर के जुवां पर थी ।  ये इस कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता मंत्री अशोक चौधरी की बड़ी कामयाबी रही। किसी कार्यक्रम को सफल बनाना खास कर जातीय रैली जैसे कार्यक्रम को, एक चुनौती तो होती है। वो भी तब जब इस कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी। जब झलकारी बाई के कार्यक्रम में उनके आशातीत भीड़ नहीं जुट पाई थी। इसके लिए सीएम ने मंच से अशोक चौधरी की वाहवाही भी की।   ये वो बातें रही जो बाहर से दिखी या दिखाई गई। बकौल अशोक चौधरी इस भीड़ में केवल दलित  शामिल नहीं हुए थे। इसमें दलित का भला सोचने वाले ईबीसी, ओबसी और मुस्लिम समुदाय के लोग भी जुटे थे। इनसे बात करने के बाद ये मालूम हुआ कि वेटनरी कॉलेज ग्राउंड से लेकर एयरपोर्ट की सड़कों पर खचाखच भरी भीड़ में बड़ी आबादी स...

सख्त निर्णय लेने वाले अपने नेता को हमने लाचार देखा

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बिहार विधानसभा अब मेरे लिए नया नहीं रह गया था। सदन के पहले तल्ले पर बना पत्रकार दीर्घा।  कैंपस की मखमली हरी घास से सीढ़ीयों की रेड कार्पेट तक की रेस। पोर्टिको के आगे लगते नारे, प्रदर्शन और बयानबाजी। अब सबकुछ सेट हो गया था। कब किस पार्टी के नेता कैंपस में एंट्री करेंगे। कहां किनका प्रदर्शन होगा। किस पार्टी का प्रदर्शन कितनी देर चलेगा। इन सब की समझ एकदम क्लियर है? सप्तदश (17वीं) विधानसभा का 10वां सत्र था, जब बतौर पत्रकार सदन की कार्यवाही कवर करने इस ऐतिहासिक इमारत में मेरा आना हुआ था। बदलाव बस इतना भर था कि इस बार सारा निर्णय खुद लेना था। हां कंधे पर प्रवीण सर (मेरे संपादक जी) का हाथ जरूर था, लेकिन सत्र की किस एक्टिविटी को कितना तवज्जो देना है ये निर्णय लेने की जवाबदेही सर ने मुझे दे दी थी।   5 दिवसीय शीतकालीन सत्र में बिहार के परिप्रेक्ष्य से ऐतिहासिक निर्णय लिए जाएंगे, इसकी सूचना सत्र की घोषणा से पहले ही सूचनाओं के संसार में तैरने लगे थे। देश के इतिहास में पहली मर्तबा किसी सदन में जातीय और आर्थिक गणना की रिपोर्ट पेश होगी इसकी ताकीद तो हमारे वजीर-ए-आला ने महीनों पहले ही कर ...