Posts

Showing posts from May, 2017

एक साल में बोकारो ने मेरी पत्रकारिता की चाहत को पंख दिया है

Image
31 मई 2016, सेल के बनाए शहर बोकारो से पहली बार मेरा राफ्ता हुआ था. जेठ की दुपहरी में ढ़ेर सारी उम्मीदें और मन में थोड़ी घबराहट के साथ यहां कदम रखा था. पास में कुल जमा 10 महीने का अनुभव था. वह भी डेस्क का. मेन स्ट्रीम से इतर.ख्वाहिश थी पत्रकारिता को उसके सबसे नीचले पायदान से जानने और समझने की. एथिक्स का जो ककहरा पूरे चार सालों में पढ़ा था उसे हर स्तर पर समझना चाहता था. इसीलिए भैयाजी के मना करने और तनख्वाह भी अपने समकक्षों से कम होने के बाद भी दिल्ली को छोड़ बोकारो आना स्वीकार किया था. कभी रिपोर्टिंग नहीं किया था. प्रॉपर्टी टाइम्स के लिए लिखते वक्त किसी से बात भी करनी होती थी तो फोन से ही काम चल जाता था. बिलकुल नया चैलेंज, नए लोग एक ऐसे शहर में जहां मेरा क्या मेरे खानदान में किसी का ताल्लुकात नहीं था. जब दिल्ली से बोकारो के लिए निकल रहा था अच्छे से याद है जब पहली दफा मैं बोकारो समाहरणालय में यहां के डीसी राय महमापत रे से मिलने गया था. नीचे से उपर तक कांप रहा था. डर के मारे मेरी आवाज नहीं निकल रही थी. आज सर से हर मुद्दे पर बेझिझक बात करता हूं. बिना किसी डर के. जिस जिला शिक्षा पदाधि...

मां के नाम एक ख़त...

मेरी प्यारी मां, मां, आपको पता है आज मदर्स डे है.  भला आपको कैसे पता होगा.  आप अपने बेटे की तरह शहर में थोड़े रहती हो जो दिखावे की दुनिया में जीता है. आप तो गांव की शुद्ध और सच्ची दुनिया में रहती हो. मां अब हमारा देश पश्चिमि यानी विदेशी यभ्यता,  कल्चर, संस्कृति को अपना रहा है. इसकी कुछ चीजें अच्छी है मां.  कुछ बेहद ही बुरी. एकदम से भद्दी. अब बोलिए न लोगों को मदर्स डे भी मनाने की जरूरत पड़ गई. क्या एक बेटे को अपनी मां के लिए किसी खास दिन की जरूरत है मां. क्या मां के होने का उत्सव साल में केवल एक दिन मनाया जा सकता है. क्या मां न्यू ईयर की भांति होती है जो 31 दिसंबर की आधी रात से शुरू रोती है 2 जनवरी होते ही समाप्त. मां तो प्रकृति से प्रदत्त वो अनमोल उपहार है जिसकी न किसी से तुलना की जा सकती है और न ही उसे किसी खास दिन में समेटा जा सकता है. मां तो केवल प्यार की जा सकती है. अनंत, असीम प्यार.जितना भी कर लो वो स्नेह कम ही है. इन शहरियों की तरह आपका बेटा भी अब शहरी हो गया है मां.  देखिए न तभी तो मदर्स डे पर ही आपको ये खत लिख रहा. हां मां,  जब हम एक समाज का...

काबिलियत और कामयाबी के बीच की कड़ी होते हैं बॉस

Image
बॉस. नाम सुनते ही दिल में कई तस्वीरें उभर आती है. जब तक स्टूडेंट लाइफ में रहा कम ही लोगों से उनके बॉस की तारीफ सुना था. बॉस के नाम के आगे लोग खूसठ, खड़ूस, बदमिजाज जैसे विशेषण लगाने के बाद ही आगे कुछ बताते थे. लेकिन मेरी मानें तो (दो साल में जितना समझ पाया हूं) एक प्रोफोशनल इंसान के जीवन में बॉस की वही भूमिका होती है जो एक नवजात के लिए उसकी मां की. खास कर जब आप फ्रेशर हों. बॉस के सपोर्ट के बिना कभी कोई काबिल कामयाब नहीं बन सकता. शायद इसीलिए बॉस को कभी कठोर तो कभी सॉफ्ट होना पड़ता है. यह मेरा अनुभव है जरूरी नहीं मैं सही ही रहूं. शिव खेड़ा और मेरे बीच में थोड़ा पीछे मुस्कुरा रहे शख्स ही लोकेश सर हैं                  13 मई 2015.इसी दिन मेरी मुलाकात मेरे पहले बॉस से हुई थी. उस दौरान मैं मिट्टी के उस लोंदे के समान था जो घड़ा बनने के लिए बिलकुल तैयार था. जरूरत थी उसे एक शेप देने की. लोकेश भारती सर मेरे जीवन के वे कुम्हार हैं जिन्होंने मुझे आकार दिया. कॉलेज के अल्हड़ लाइफ से सीधा लोकेश सर के हवाले कर दिया गया था. तब नवभारत टाइम्स के सप्लीमेंट...