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Showing posts from July, 2020

रुचि

बात 2010 की है। दसवीं की परीक्षा पास कर लिया था। इंटर में एडमिशन लेना था। मैथ्स में अपने तीनों भाइयों में थोड़ा बेहतर था। केमिस्ट्री का सूत्र कभी पल्ले नहीं पड़ा । अंग्रेजी अभी तक सही से बुझाती नहीं। तब तो गुड्डू सर भरी क्लास में फटकार लगा दिए थे कि बाबा चार लाइन में तीन लाइन अंग्रेजिए बतियाते हैं और पोता तीन शब्द के एक वाक्य का ट्रांसलेशन नहीं कर पा रहे हो। कुल मिलाकर हर विषय में हाथ तंग थे। पापा से ज्यादा मोहल्ले वाले का दबाव था कि फलनमां के बेटवा आर्ट्स में नाम लिखैलकैं है। आर्ट्स गांव में पांच साल पहले तक कम पढ़ने वालेे लड़कों का विषय था। तय हुआ कि भैयाजी की तरह ही साइंस पढ़ेंगे। मैथ्स की जगह बायोलॉजी रखेंगे। मेरी दिलचस्पी जरा सी भी नहीं थी। 2012 में एक बार फिर उसी मुहाने पर खड़ा था। अंतर बस इतना था कि दसवीं में अनंत(लंगोटिया यार) से प्वाइंंट पर्सेंट पीछे रहने के बाद मिली बेइज्जती को मैंने इंटर में संभाल लिया था। अब ये तय कर लिया था कि मुझे बनना क्या है। लेकिन अब पापा और भैया जी आकांक्षाएं मेरे साथ जुड़ गई थी। पापा बी फार्मा कराना चाहते थे। इस सोच के साथ कि...

एक जरूरी सूचना

24 अप्रैल को मैंने एक पोस्ट लिखा था। इसमें रांची को संभलने की ताकीद किया था । कहा था, स्थिति बिगड़ी तो इस शहर को संभालना मुश्किल हो जाएगा। जिसका डर था। उसके हालात बन गए हैं। यह पोस्ट डराने के लिए बिलकुल नहीं है। बल्कि कुछ सच्चाइयां बताने के लिए हैं। राजधानी के मौजूदा हालात को इस उदाहरण से समझिए। रांची के एक मोहल्ले में एक परिवार के सभी सदस्यों की कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई। उसमें बुजुर्ग माता-पिता से लेकर बच्ची समेत आठ सदस्य शामिल हैं। रिपोर्ट की जानकारी जिला प्रशासन को मंगलवार (14 जुलाई) सुबह 11 बजे तक मिल गई थी। बुधवार (15 जुलाई) दोपहर 2 बजे तक उनमें से किसी को कोविड अस्पताल नहीं ले जाया जा सका था। इस बात की जानकारी होते हुए भी कि संक्रमित बूढी मां की स्थिति क्रिटिकल है। उन्हें सांस लेने में परेशानी है। ये हालात उस शख्स के परिजन की है जिनकी पहुंच जिला प्रशासन के लेकर सीएमओ तक है। वह पूरे दिन परेशान रहे लेकिन उनके परिजनों को न तो कोई ये बताने वाला था कि किस प्रकार की दवा लेनी है और न ही कोई उनकी खबर लेने वाला था। ये हालात क्यों हैं? अब जरा इसे समझ लिजिए। राजधानी रांची में...

मरीज हैं गुनहगार नहीं

कोरोना उग्र हो चुका है। सरकार माने न माने झारखंड में इसका विस्तार सामुदायिक स्तर पर हो गया है। हम सबको इसके बीच जीने की आदत डालनी होगी। हर उस जरूरी मापदंड का पालन करना होगा जिससे हम इससे सुरक्षित रह सकें। जान और जहान दोनों हमारे लिए जरूरी है। अपना ख्याल अगर आप खुद नहीं रखिएगा तो ये व्यवस्था समाज की नजरों में आपको गुनहगार साबित कर देगी। इसकी एक बानगी आज की एक घटना से समझिए। मेरे मोहल्ले की सुबह सावन के फुहारों से शुरू हुई । गीली सड़कें और उस पर सन्नाटा। बीते दिनों की तरह ही कुछ महिलाएं घर से दूध लाने, सब्जी लाने घर से बेधड़क निकल रहीं थी। गली में पानी वाला भी आया और दूध वाला भी। अब तक किसी को इस बात का इल्म नहीं था इस मोहल्ले के शुरुआती मकान में एक शख्स कोरोना संक्रमित पाया गया है। सुबह की ठंडी हवा में धीरे-धीरे ये खबर आग की तरह फैलने लगी। लोगों के यकीन को पक्का कर दिया निगम की उस गाड़ी ने जिसने अपनी टंकी का पूरा केमिकल उस संक्रमित घर के आगे उड़ेल दिया। सेनेटाइजेशन की इस प्रक्रिया को देखने के लिए पूरा मोहल्ला अपने-अपने छतों पर या बालकनी में था। यह प्रक्रिया पिछले दो महीने...