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Showing posts from October, 2017

कतारबद्ध जाती महिलाएं और मेरी हैरानी

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दिन रविवार। दोपहर के 12 बज रहे थे। दफ्तर की मीटिंग के बाद चाय की तलब में नया मोड़ की ओर निकला था। अभी पहला ही मोड़ पहुंचा था कि आंखों को एक न यकीन होने वाला दृश्य दिखा। तकरीबन 17 महीने बीता चुका हूं बोकारो में। यह नजारा बिलकुल नया था। सामान्य सी दिखने वाली सैकड़ों महिलाएं बिलकुल कतारबद्ध होकर चली जा रहीं थी।बदन पर सामान्य सी साड़ी, सलवार, हवाई चप्पल, बालों में भरपूर मात्रा में तेल, हो ठों पे कोई लिप्सटिक नहीं। इस सड़क पर इस प्रकार की इतनी महिलाओं का दिखना मुझे हैरान कर गया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित महिलाएं बाइक की रफ्तार धीमी कर जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, इनकी संख्या उतनी ही तेजी से बढ़ रही थी। ट्रैफिक नियमों का बिना उल्लंघन किए ये आपस में गप्पे मारते चले जा रहीं थीं। अब तक मैं लगभग 500 मीटर की दूरी तय कर चुका था।अब मुझसे रहा नहीं गया। एक बैच लगाए सज्जन से पूछा ये महिलाएं कौन हैं और कहां जा रहीं हैं? उन्होंने मुझे घूरा। मैंने तुरंत अपना परिचय दिया। बाइक की हैंडिल पकड़ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। ये वनवासी महिलाएं हैं। बोकारो के अलग-अलग प्रखंडों से (गोमिया, ललपनिया, क...

लालिमा

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साल 2001, महीना हिन्दी में माघ और अंग्रेजी में फरवरी का था। उस साल की सर्दी अपने आखिरी दिन गिन रही थी। शाम के लगभग सात बज रहे होंगे। दालान(घर के बाहर का एक कमरा) के बाहर दादाजी का बैठका लगा था। अंदर हम भाई-बहन पढ़ाई कम दिनभर की कानाफूसी में मश्गूल थे। इतने में एक मद्धिम आवाज में भर्र-भर्र करती हुई स्कूटर हमारे दरवाजे पर रुकी। हम भाई-बहन दौड़ते हुए कमरे से बाहर आए। पापा पीछे से उतर रहे थे। मनोज दा(अब स्वर्गीय हो गए) इसे एसएम ऑटोमोबाइल, शेखपुरा से ड्राइव कर लाए थे। चटकदार नीले रंग के एलएमएल की व्हेस्पा को देखकर घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दादाजी, हम बच्चे कभी उसके आगे जा कर तो कभी पीछे से उसे देख रहे थे। तब मनोज दा ने बताया था कि ये फिलहाल व्हेस्पा की टॉप मॉडल है। उस समय इसकी कीमत 35 हजार रुपए थी। पापा इससे पहले कभी कोई बाइक नहीं चलाए थे। साइकिल थी उसे चलाकर ही खुश रहते थे। दादाजी एक दिन अचानक बात-बात में बोल दिए थे साला मेरा बेटा होकर कब तक साइकिल से चलेगा, जाओ पसंद की बाइक खरीद लो। रामकिशोर चा (हमारे पड़ोसी) पापाजी को कॉलेज ग्राउंड में ले जाकर कुछ बेसिक च...

देहाती की नजर से बोकारो

झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस नई दिल्ली स्टेशन से 22 घंटे की यात्रा पूरी कर एक स्टेशन पर रुकती है। बाहर झांकने पर प्लेटफॉर्म के आखिरी छोर पर पीले रंग का एक बड़ा से चौकोर बोर्ड दिखा। इस पर काले रंग से लिखा था बोकारो स्टील सिटी। यानी मेरा डेस्टिनेशन। स्टेशन परिसर से बाहर निकलते ही एक क्रम में खड़े लाल और सफेद रंग की चिमनियां और उससे हर वक्त निकलने वाले धुएं आपका परिचय उद्योग की इस नगरी से कराते हैं। 1965 में बना सेल ( स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड ) का देश में यह दूसरा सबसे बड़ा प्लांट है ( यहां लगभग 23 हजार से ज्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं ) प्लांट के चहारदिवारी के बगल से गुजरने वाली सड़क से लगभग 10 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद आता है मुख्य शहर। जहां सेल के सिंबॉल वाला नीले कलर का तोरण द्वार अपने आगंतुकों का बोकारो इस्पात नगर में स्वागत करता है। झारखंड के इस शहर में प्रवेश करते ही नजारा बिलकुल बदला - बदला सा दिखता है। यहां की सड़कों पर पटना , दिल्ली या मुंबई की तरह गाड़ियों का रेला नहीं है। लोगों में हॉर्न बजाने की हो़ड़ भी नहीं है। सड़कें पूरी तरीके से खाली है। लोग अपनी मस्ती में ...

रात दो बजे के बाद भी वो आखिरी पन्ना नहीं भेज पाने का अफसोस

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रात के दो बज रहे थे। सिटी सेन्टर के साथ ही उसके सबसे आखिरी कोने मे स्थित मेरा दफ्तर भी बिलकुल वीरान हो चुका था। सारे लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। ऑफिस का पीएनटी नंबर, मेरा मोबाइल और ओमकार भैया (चीफ विजुअलाइजर) के मोबाइल लगातार बज रहे थे। पिछले 30 मिनट से हमदोनों के एक में हाथ मोबाइल और दूसरा हाथ की-बोर्ड पर चल रहा था। 150 किलोमीटर दूर हमारे बॉस दस मिनट में आठ बार मुझे कॉल कर चुके थे। एकदम सामान्य समझाने से शुरू हुई हमारी बातचीत उनके गुस्से तक पहुंच गई थी। हम परेशान थे। बॉस को मुझसे भी ज्यादा फोन आ रहे थे। हमारे सिस्टम को धनबाद से लेकर जयपुर तक के लोग रिमोट पर ले चुके थे। लेकिन शनिवार एडिशन का वह छह नंबर पेज जिसके मास्ट हेड पर लिखा था बेरमो आसपास। हम नहीं छोड़ पाए। हम लाचार थे। मैं और ओम भैया आखिर तक मेहनत करते रहे। डेस्क के दौरान किए गए काम-1 शंभु इस मुश्किल घड़ी में की गई हमारी मेहनत को हम बेकार नहीं जाने देंगे।ओम भैया ने कहा। एक बार और ट्राई करो। यह तीसरी मर्तबा था जब मैं उस पेज का करेक्शन कर रहा था। इस बार थोड़ा गंदा भी किया था। लेकिन सर्वर की हमसे नाराजगी ऐसी कि उसके ...