औरत की ममता
हर रोज की तरह 28 अगस्त की सुबह भी सुषमा दी दरवाजा नॉक कर कमरे में आई. 15*6 के इस गुलाबी रंग के दीवार वाले कमरे में सब कुछ वैसा ही था जैसा वह पिछले 13 महीनों से देखते आ रही थीं. फर्श पर रात के जूठे बर्तन, दो पानी की बोतल और टेबल पर बेतरतीब तरीके से रखे पुराने अखबार, दो किताबें और चार कलम. दीदी झाड़ू लगा रही थी, जूते से बाहर के जो गर्दे कमरे में आ गए थे, खाने के वो रैपर जो बिखरे थे उसे साफ कर रहीं थी. अचानक उनकी निगाह हल्दी और चूने के उस प्लेट पर गई जिसका पेस्ट मैंने रात में बनाया तो था पर लगया नहीं था. दीदी परेशान निगाहों से मेरी तरफ देखी. उनकी नजर मेरे दाए हाथ पर रुकी जो अपने आकार से कहीं मोटा था. घबराते हुए पूछी क्या हुआ शंभू भैया ? उनके सवाल में एक अपनापन था. उनके चेहरे पर एक खा़मोश सा डर था. बताने की इच्छा नहीं होने के बाद भी उनकी इस घबराहट और अपनपन के आगे झूठ नहीं बोल सका... बता दिया, एक्सिडेंट हो गया दीदी जिससे हाथ में थोड़ी चोट आई है... ये क्यों नही लगाए.? हल्दी की ओर इशारा करते हुए उन्होंने पूछा... इससे कुछ होता है क्या? मुझे लगा कहीं और कुछ नया झमेला न...