एक खत भैया जी के नाम
आदरणीय भैया जी, आज आप पूरे 29 वर्ष के हो गए। मन में खयाल आया कि इस मौके पर क्यों न आपको एक खत लिख डालूं। फिलहाल मैं यही कर सकता हूं। लिखने के लिए सिस्टम के सामने बैठ तो गया। लेकिन यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि आपके ख़त की शुरुआत कहां से करूं। एक अजीब से उलझन में उलझ गया हूं। इसकी शुरुआत बचपन की उन खट्टी –मिट्ठी किन्तु प्यारी यादों से करूं जहां हम हर रोज झगड़ते थे पर कभी भी आपने हमें पापा-मम्मी से पिटने नहीं दिया। पापा से खुद तो कई दफा पिटे लेकिन कभी भी हमारी शिकायत उनसे नहीं की। हमारे हिस्से की मार भी कई मर्तबा आपने खुद खाई। पूरे घर वालों से छिपाकर हमलोग को वह पार्लेजी वाला बिस्किट का पैकेट और पीटर झा के दुकान वाला नमकीन याद है न आपको किस तरह आप हर शाम हमलोगों को दिया करते थे। हां आप बड़े थे तो थोड़ा ज्यादा जरूर खाते थे लेकिन शेयर करना कभी नहीं भूलते थे। या फिर इसकी शुरुआत उस समय से करूं जब हमारे बिखरते सपनों को आपने अपने बूते संवारा। जब हमारी खुशी के लिए आपने अपने हर ख्वाब को त्याग दिया। अपने छोटे भाई-बहनों को बेहतर शिक्षा देने के लिए आपने अपनी शिक्षा को बीच में रोक दी। भै...