गर उस रोज कंधे पर उस हाथ का स्पर्श न हुआ होता...
लगभग छह साल पहले की घटना है। तब मैं दिल्ली के लिए बिलकुल नया था। न वहां की सभ्यता से परिचित था न संस्कृति से और न ही लोगों से। बस दिल में कुछ ख्वाहिशें और उसे पूरा करने की चाहत थी। न उसके आगे का संघर्ष मालूम था न उसकी डगर। घर छोड़ते वक्त पापा ने कहा था बहुत उम्मीदें है तुमसे। कभी निराश मत करना। इन सारे जज्बातों को समेट कर जीटीबी नगर के उस कॉलेज (IIMMI) में दाखिल लिया था। लेकिन शुरुआत में ही इस कदर टूटने लगूंगा इसकी कभी कल्पना नहीं की थी। दिन , सप्ताह और महीना बीत गया। न मेरी समझ में क्लास की बातें आ रहीं थी न उस क्लास के माहौल। टूटने लगा था। हर दिन क्लास के बाद खुद को कोसना शुरू कर दिया था। पापा और भैया दोनों के फैसले से उलट मैंने इस कोर्स में दाखिला लिया था। वापस आने का कोई ऑप्शन नहीं था। ऐसे ही एक रोज कैंटिन के बाहर खुद में खोया था। आंखें नम थी। उनसे दो - चार बूंद निकल कर कब के सूख गए थे। तभी मेरे कंधे पर एक हाथ का स्पर्श हुआ। पीछे मुड़ा तो दिलीप पांडेय सर थे। जो पहले दिन से क्लास ले रहे थे और क्लास के 40 बच्चों के साथ मुझे भी एब्जॉर्ब कर रहे थे। सर ने कंधे...