मेरे गांव का कोई बच्चा अब 'नक्कट राम' से नहीं डरता है
बिहार में पंचायत चुनाव चुनाव चल रहा है । गांव की सरकार के गठन की प्रक्रिया में एक बार फिर शराबबंदी चर्चा में है। बंदी की घोषणा के 5वें वर्ष में ही इसकी सफलता और असफलता पर सवालिया निशान है। सार्थकता पर हर किसी के पास एक कहनी है। मुद्दा बड़ा है। इस पर खिड़कीनुमा स्क्रीन वाली लंबी बहस की जा सकती है। लेकिन, यहां मैं शराब और चुनाव के बीच अपने गांव में एक छोटे से बदलाव की जानकारी साझा करना चाहता हूं।नगर परिषद हो जाने के कारण मेरा गांव फिलहाल पंचायत चुनाव की गर्मी से दूर है। सो ऐसे भी वहां मुर्गा-भात और नाच-गाना फिलहाल नहीं चल रहा है। अब मेरे गांव का अब कोई बच्चा "नक्कट राम' (हालांकि अब ये नहीं रहे) से नहीं डरता है। इस नाम को यहां एक पात्र के रूप में रख लें। कहानी आगे है। नक्कट राम कोई डरावने इंसान नहीं थे। सुबह वे हर बच्चे को प्यार और पुचकार करते थे। उससे दोस्ती करते थे। शाम ढ़लते ही घर से 100 मीटर दूर ही बच्चे को समझ आ जाता था कि नक्कट राम आ गए हैं, भागो। काम खत्म कर वे रोज एक तय मात्रा में शराब पीते थे। झूमते-हंकड़ते (चिल्लाते) हुए अपने घर तक जाते थे। बस उनकी यही आवाज बच्चों क...