2016: कुछ काम किया ज्यादा प्यार मिला..
एक और वर्ष हमें अलविदा कह गया. कागज और दिलों में कई यादें छोड़ गया. यादें खट्टी के साथ मीठी भी होती है. जाहिर है इस वर्ष भी रही होगी. मेरी भी है कुछ हरी मिर्च की तरह तीखी तो साथ में गुलाब जामुन सी मीठी भी है.
2016 का मेरा शुरुआती झटका था नवभारत टाइम्स में कांट्रैक्ट का पूरा होना. यहां से निकलने का न मेरा मन था. न मेरे गुरुदेव की इच्छा थी कि शंभु यहां से जाए. लेकिन दोनों के हाथ में कुछ नहीं था. जिनके हाथ में था उन्होंने हाथ खड़े कर दिए. नवभारत टाइम्स में कभी लगा ही नहीं कि यह मेरी पहली नौकरी है. लोकेश सर एक बॉस कम बड़े भाई ज्यादा बन गए थे. जितना परेशान मैंने उन्हें किया शायद ही किसी ने किया होगा. गुस्सा भी आता था उन्हें लेकिन केवल प्यार से समझाते थे. राजेश सर, किस्मत से ही ऐसे बॉस नसीब होते हैं. चाहे उनके समझाने का तरीका हो या डाटने का बिलकुल ही अलहदा था. प्रिय सर की बात ही क्या करूं. सपोर्ट सिस्टम हैं ये मेरे (हां अभी भी). अनुराग भैया के हाथ में तो खैर मेरी कमांड ही है. एक झटके में मैं इन सबसे अलग कर दिया गया..
अभी 2016 शुरू होने में कुछ दिन बाकी ही था कि रंजीत सर लाइव इंडिया डॉट कॉम के लिए बुला लिए. यहां या तो मैं काम को समझ नहीं पाया या डॉट कॉम के लिए मेंटली प्रिपेयर नहीं था. यह मेरे लिए साल का दूसरा झटका था. लेकिन यहां मुझे मेरी बड़ी बहन समान रिम्मी दी मिली.. बसंत झा सर जैसे काबिल संपादक से मुलाकात हुई. और हां रंजीत सर से चार महीने में कम से कम 20 बार डांट भी मिली. लेकिन डॉट कॉम की चीजें उन्होंने सीखाया भी. चार महीने तक ही यहां टिक पाया.. स्वेच्छा से बेरोजगार हो गया..

2016का या तो सबसे खराब समय या मेरी जिंदगी का सबसे निर्णायक काल था यह.. यही वो समय था जब मैंने दिल्ली छोड़ने का तय किया. आसान नहीं था 6 साल दिल्ली में बिताने के बाद वापस छोटे शहरों का रुख करना..सबसे बड़ा या तीसरा झटका कह सकते हैं भैया जी से जुदा होना..

शुक्रिया नीरज और आनंद दत्ता भैया का जिन्होंने मुझे झारखंड की पत्रकारिता में उतारा. शायद मैं इसी पल का इंतजार कर रहा था. इन्टरवयु के समय धर्मेंद्र झा सर बोले शंभु मेरे पास केवल बोकारो में जगह है और तुम्हें वहीं काम करना होगा. कभी बोकारो देखा नहीं था. पर आना स्वीकार कर लिया. यहां शुरुआत के महीने में थोड़ा संघर्ष जरूर किया. लेकिन मौजूदा समय में जमकर काम कर रहा हूं. हर किस्म की रिपोर्ट लिख रहा हूं. रिपोर्ट की प्रशंसा भी होती है तो आलोचना भी. एक रिपोर्टर के लिए इससे बढकर खुशी और क्या हो सकती कि रिपोर्ट पढते ही लोग समझ जाएं कि ये शंभु की रिपोर्ट है. जहां जाता हूं लोगों का प्यार पाता हूं. देखते ही जानने वाले गले लगाकर कहते हैं शंभु अच्छा लिख रहे हो इसी तरह लिखो.. बोकारो में तनख्वाह कम भले है.. लेकिन लेखनी को इज्जत खूब मिली है.. राजेश यादव जैसे बड़े भाई मिले हैं.. हां संतोष सिंह थोड़े टफ बॉस जरूर हैं लेकिन प्यार उनका भी मिला. काम के लिहाज से यही किया हूं 2016 में.
रही बात पर्सनल लाइफ कि तो लड़कियां पटाना न दिल्ली में सीखा था और न ही बोकारो में सफल हुआ हूं.. एक दो पसंद भी आई लेकिन... खैर छोड़िए... बाद बाकी पापा मम्मी भैया का प्यार सदाबहार मिला..पापा की तबियत बीच में थोड़ी गड़बडाई जरूर लेकिन अब पापा ठीक हैं...

कुल मिलाकर 2016 कई अच्छे लोगों का सान्निध्य दे गया.. कुछ काम किया हूं बहुत ज्यादा अभी करना है....बेहतर की तलाश जारी है.. 2017 से ढेर सारी उम्मीदें हैं...होता तो वही है जो होना होता है. मेरे भैया जी अक्सर मुझसे कहते हैं जो होता है अचछा होता है..
आखिर में कविवर शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की पंक्ति कि..
जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद
जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं,
सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं
दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रमाद

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