डियर सुगंधा,
आज पुर्णिमा है. सावन की.  कुछ नया नहीं है. अलग भी नहीं. यह हमेशा से आते रहा है. अभी से 12 घंटे बाद चला भी जाएगा.  अंतर बस इतना है कि आज हर बहन अपने भाई के पास पहुंचने की कोशिश कर रही होंगी. अमूमन तो पहुंच भी गई होंगी. अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध रही होंगी. वह जीवन के रंगों की तरह रंग-बिरंगी होंगी. अलग-अलग डिजाइन भी होंगे उनके. भाइ के ललाट पर रोड़ी का गोल या लंबा टीका भी लगाई होंगी. उनके ऊपर चावल के कुछ दाने भी चिपकाई होंगी. आखिर में स्टील या पीतल की थाली में कपूर के लौ या घी के दीपक से उनकी आरती भी उतारी होंगी. उस परम शक्ति से अपने भाई के लंबी उम्र, कुशक्तियों से रक्षा और बुरी नजर से बचाव की प्रार्थना भी की होंगी. भाई अपनी बहना की ललाट को प्यार से चूम रहे होंगे. कोई गोद में उठा रहे होंगे.कई तो अपनी बहन की राखी वाली सेल्फी सोशल मीडिया पर भी डाल रहे हैं. सुगंधा मैंने भी अपने व्हट्सएप के वॉलपेपर में अपनी और तुम्हारी साथ वाली तस्वीर लगाई है. वही वाली तस्वीर जब तुम दिल्ली खेलने आई थी और हम तुमसे मिलने तुम्हारे होटल आए थे.

सावन के पुर्णिमा के आने की घटना हमारे जीवन में पहली बार नहीं है बहन. और कोई नई बात भी नहीं कि इस दिन तुम पटना के अपने किराए वाले कमरे में हो और मैं बोकारो के अपने छोटे से केविननुमा किराए वाले कमरे में. अकेला. कभी तुम्हारी तस्वीर को देखता हूं तो कभी फेसबुक पर दोस्तों की ओर से डाली जाने वाली तस्वीरों को. बहन पिछले 15 वर्षों में बेहद कम बार हम भाई-बहन इस दिन को साथ में बिताए हैं. अगर साथ रहे भी हैं तो तुम्हें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने का सौभाग्य नहीं मिला है. हमारी कलाई इस दिन हमेशा सूनी रही है बहन. न ललाट पर टीका लगा है.  और न ही तुमने गिफ्ट की फरमाइश की है. बचपन में हमलोग दूसरों को देख कर रो लेते थे.  थोड़ी देर बाद शांत भी हो जाते थे. रो अब भी रहा हूं. लेकिन अब आंसू नहीं निकलते.
     
               
हम अपने उस चाचाजी को कभी नहीं देखे बहन जो आज ही के दिन चल बसे थे. हम हमेशा उनकी इज्जत करेंगे. लेकिन कभी तुम्हारी खुशी पर आंच भी नहीं आने देंगे. तुम्हारी खुशी में ही हम भाइयों की खुशी है. हमेशा खुश रहना बहन..
                                   तुम्हें सबसे ज्यादा डांटने वाला,
                                        तुम्हारा छोटा भाई...

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