भीम संसद या भीड़ तंत्र
पटना के वेटनरी कॉलेज ग्राउंड में जेडीयू की तरफ से संविधान दिवस के दिन भीम संसद का आयोजन किया गया। कार्यक्रम ऐतिहासिक रहा। भीड़ अप्रत्याशित रूप से जुटी। वेटनरी कॉलेज में आज तक इस तरह की भीड़ जमा नहीं हुई थी। ये बात सीएम नीतीश कुमार भी मान लिए। कार्यक्रम को बेल डेकॉर किया गया था ये बात उस रास्ते से गुजरने वाला हर राहगीर के जुवां पर थी ।
ये वो बातें रही जो बाहर से दिखी या दिखाई गई। बकौल अशोक चौधरी इस भीड़ में केवल दलित शामिल नहीं हुए थे। इसमें दलित का भला सोचने वाले ईबीसी, ओबसी और मुस्लिम समुदाय के लोग भी जुटे थे। इनसे बात करने के बाद ये मालूम हुआ कि वेटनरी कॉलेज ग्राउंड से लेकर एयरपोर्ट की सड़कों पर खचाखच भरी भीड़ में बड़ी आबादी सरकारी कर्मियों की थी, जो टोला सेवक, विकास मित्र या अन्य तरीके से सरकारी सेवा का लाभ ले रहे हैं। इसकी बकायदा बातचीत है मेरे पास।
अब सवाल ये कि भीम संसद क्या केवल भीड़ जमा करने के लिए था? क्या इस भीड़ से ये तय हो गया कि संविधान अब खतरे में नहीं है? क्योंकि इसके रखवाले एकजुट हो गए हैं? या ये केवल एक नेता को खुश करने के लिए जमा भीड़ थी। क्योंकि इसमें नया कुछ भी नहीं था। न सीएम की स्पीच में न मंत्रियों के आश्वासन में। एक बड़ी आबादी आश लेकर यहां जुटी थी लेकिन निराश होकर निकली।
ये सच है कि ये रैलियों के काल का आरंभ है। अगले कुछ महीने तक जाति, समुदाय, विकास, विनाश भांति-भांति नाम की रैलियां होगी। लेकिन रैली जब सरकार की हो। दलित के हक के नाम पर हो तब ये समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि ये भीम संसद था या भीड़ तंत्र।




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