जाति के नाम पर एकजुटता की सियासत कहाँ गई?
'नीरजबा .... है.. जब तक जिंदा रहेंगे उसका विरोध करेंगे... उसने हमारे घर में AK-47 रखवा कर हमको जेल भिजवाया है...'
— अनंत सिंह, विधायक, मोकामा
'ई हमारा जमानत जब्त कराएगा जी... जमानत लिखने आता है इसको?... इसके गांव लदमा (ब्रह्मर्षि स्थान) में न 'नरमुंड सम्मेलन' करवाए थे जी... गाड़ी में और घर में क्रिमिनल लेकर घूमता है.. हमको इसके सपोर्ट की जरूरत है क्या?'
— नीरज कुमार, MLC, पटना स्नातक
चंद रोज पहले तक सवर्ण, खासकर भूमिहार समुदाय के लोग खुद को प्रताड़ित महसूस कर रहे थे। गांव से लेकर शहर के किसी भी चौराहे या चाय के ठीये पर बैठ जाइए, बस यही चर्चा का विषय था कि— 'सम्राट चौधरी/सरकार सवर्णों के लिए खतरा है।' हालांकि अब तक ऐसा कुछ स्पष्ट रूप से प्रतीत होता दिखाई नहीं दे रहा है।
लेकिन चाय की दुकान पर जुटने वाले 'बकैतों' के पास इसके पक्ष में अपने मजबूत तर्क मौजूद हैं। NEET छात्र हत्याकांड से लेकर भरत तिवारी एनकाउंटर तक— सभी घटनाओं को सवर्णों को प्रताड़ित किए जाने के तथ्य के रूप में सरेआम पेश किया जा रहा है। अब उसमें एक भूमिहार अधिकारी को डीजीपी पद से जबरन हटाए जाने का प्रकरण भी लोग जोड़ दे रहे हैं। बकैती के लिए अब पर्याप्त मसाला मौजूद है।
लेकिन अब इनकी बातचीत का रुख बदल गया है। एकदम टटका (ताजा) कंटेंट है— बाहुबली विधायक अनंत सिंह और विधान पार्षद नीरज कुमार के बीच छिड़ी जुबानी जंग! दो भूमिहार नेता आपस में भिड़ गए हैं और अब सब इसका लुत्फ उठा रहे हैं। अब तक सरकार को सवर्ण-विरोधी बताने वाले सवर्ण समाज का एक बड़ा तबका अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार अनंत सिंह और नीरज कुमार के खेमों में बंट गया है।
अब जरा ठंडे दिमाग से सोचिए कि ये नेता आखिर किसका भला चाहते हैं? ऐसे में समाज का भला कैसे होगा? ये आपस में ही 'माय किरिया... बाप किरिया' करते रहेंगे। एक भूमिहार को हराने के लिए दूसरा भूमिहार किसी तीसरे भूमिहार को मोहरा बनाता रहेगा। बाकी लोग तो बस बैठकर चकल्लस करते रहिए!
अभी विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान तरारी के विधायक विशाल प्रशांत का बयान तो याद ही होगा? कैसे उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा था— "भूमिहारों को भी एसटी (ST) का दर्जा दे दीजिए!" विशाल ने भले ही यह बात तंज में कही हो, लेकिन अगर आंकड़ों के आईने में देखेंगे तो यह आपके लिए अलार्मिंग (चिंताजनक) है।
वर्ष 2011 में गठित सवर्ण आयोग ने 2013 में अपनी एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी (जो आज तक सार्वजनिक रूप से पटल पर पेश नहीं हो पाई)। लेकिन इसकी मुख्य खोज (Findings) यह थी कि ग्रामीण क्षेत्रों के 49% सवर्ण बच्चे केवल गरीबी के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं। सवर्णों का मुख्य पेशा कृषि रहा है, लेकिन वे अपनी जमीनों को बेचने के लिए विवश हैं। स्थिति यह है कि राज्य के 55 फीसदी से ज्यादा सवर्ण ऐसे हैं, जिनके पास 1 एकड़ से भी कम जमीन बची है। शिक्षा और सरकारी नौकरियों से जुड़े आंकड़े तो और भी दयनीय हैं।
अब लौटकर फिर से 'नीरज-अनंत' वाले मामले पर आइए। यह कोई नई बात थोड़ी है कि दोनों आपस में लड़ रहे हैं! 2015 के विधानसभा चुनाव में भी दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने थे। इसी जेडीयू (JDU) ने तब नीरज कुमार को अपना उम्मीदवार बनाया था और अनंत सिंह जेल के भीतर से निर्दलीय लड़े थे। अनंत सिंह ने जेल में रहते हुए ही निर्दलीय चुनाव जीता और नीरज कुमार को 18,348 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी थी। उस दौरान भी दोनों तरफ से खूब 'तोप-तलवारें' खींची गई थीं।
यह विशुद्ध सियासत है— यहाँ जीत जरूरी होती है, जाति नहीं! आज भी पूरी लड़ाई बस हार-जीत की है कि "हम इसे हरा देंगे, तो वह किसे हरा पाएगा?" जिनके ऊपर हार-जीत से ऊपर उठकर समाज की मुट्ठी को बांधे रखने और उसकी ताकत बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वे दूसरों के सिर पर ठीकरा फोड़कर मजे से निकल जा रहे हैं।

शानदार
ReplyDeleteMan gaye guru
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