आखिर तुम्हे जाना था...


अल्लाह के प्यारे याकूब आखिर तुम्हें जाना है ये तो टाडा कि अदालत ने ही मुकर्र कर दिया था। लेकिन गर तुम यूं ही चले जाते जैसे कसाब गया तो उनका खाना कहां हजम हो पाता जिन्हें मुर्दों पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने की फितरत है, यह तमाशा कहां लगता जो कल की पूरी रात लगी, ये वैचारिक गालियां कहां पढ़ने को मिलता जो पिछले एक सप्ताह से तुम्हारे तथाकथित कुछ समर्थकों ने शोशल मीडिया पर फैला रखी थी, और हमारे गृह मंत्री की मानें तो भारत का सुप्रीम कोर्ट विश्व का पहला सुप्रीम कोर्ट कैसे बनता किसी की मर्शी पिटीशन पर रात के दो बजे सुनवाई करने वाला। ये बात दीगर है कि तुमने यह मान लिया था कि अब तुम्हें जाने से कोई नहीं रोक सकता।
    लेकिन जरा सोचो तुम बच भी जाते तो क्या चैन से सो पाते, क्या वे आत्माएं तुम्हें सुकून से जीने देती जिसकी असामयिक और पीड़ादायक मौत तुम्हारी वजह से हुई, क्या तुम चाह कर भी उस मां के आंचल में खुशियां वापस ला पाते जिसकी गोद तुमने सूनी कर दी, क्या उस औरत का सुहाग लौटा पाते जिसे तुमने उजाड़ दिए थे, क्या उस बूढ़े बाप का सहारा लौटा पाते जिसके बुढ़ापे की लाठी तुमने छीन ली थी, क्या उस नौजवान का सपना तुम पूरा कर पाते जिसने न जाने अपने जीवन क्या-क्या सपने नहीं देखे होंगे। क्या 1993 का वो दृश्य अपने ज़ेहन से मिटा पाते जिसकी दहशत से आज भी मुंबईवासी नहीं निकल पाये हैं। तुम तो अब नहीं रहे लेकिन तुम्हें पता है तुम्हारे जाने के बाद लाखों लोगों के होंठो पर एक प्यारी सी मुस्कान है तो कुछ के चेहरे मायूस भी हैं। लेकिन क्या तुम कभी चैन से मुस्कुरा या रो पाते या सुकून भरी जिन्दगी जी पाते।  क्या अपनी जीवन के 21 अनमोल वर्ष कारागार में गुजारने के बाद क्या तुम एक सामान्य जीवन जी पाते?
जब मुंबई बम ब्लास्ट को तुम अंजाम दे रहें थे तब मेरे पैर पालने में भी नहीं आये थे, हां मां के गर्भ में जरूर था, इसलिए जो भी तुम्हारे बारे में जाना लोगों से सुनकर या पढ़ कर ही जाना। जितनी जुबानें उतनी बातें ये कहावत तो तुमने भी सुना ही होगा। कोई कहता मुंबई बम ब्लास्ट में होने वाले सारे खर्च की बजटिंग तुमने ही की थी, तो कोई कहता तुम दाउद के दाहिने हाथ हो, सबसे ज्यादा हैरानी तो मुझे तब होती जब तुम्हें लोग एकस्ट्राटैलंटेड सीए बताते। और छन-छना कर ये भी सुना कि तुम इसलिए सरेंडर किए थे कि तुम्हे यह भरोसा दिया गया था कि तुम्हें फांसी की सजा नहीं दी जाएगी। रॉ के एक मुख्य चीफ में तुम्हारे प्रति कभी हां तो कभी ना वाला ब्यान-ब्यान खेल रहे थे और बहुते कुछ सुना अब सुना-सुनाया कितना लिखूं लेकिन अगर दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण को भरोसेमंद अखबार मानो तब इसने आज तुम्हारे बारे में लि्खा है कि तुम्हीं वो सख्श हो जिसने इस धमाके के लिए अपने दरिन्दे भाई की मदद की, विस्फोटकों के लिए गाड़ी तुमने ही खरीदी, यहां तक की अपने ड्राइवर को विस्फोटकों से भरा दो बैग तुमने ही दी थी।
  अब देखो जाने वाले को किसी ने रोका है, तुम तो चले ही गये हो। लेकिन तुम जाते-जाते बहुते हंगामा बरपाये हो। असली वाला जो बरपाये हो उ तो जैसी करनी वैसी भरनी तुम पा ही लिए। लेकिन अभी तुम्हरा दामन मैला तब हमरा दाम साफ अपन देश में बहुते होता है,  मौका मिले तो इसका आनंद उठाने आ जाना और शुकुन से इसका आनंद उठाना।

    

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