नीतीश के नेतृत्व में बिहार की आधी आबादी भर रही है उड़ान
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चाहे जितनी आलोचना कर लें कि वे सत्ता के भूखे हैं, लालची हैं, मौकापरस्त हैं। लालू के साथ मिलकर बिहार को एक बार फिर से जंगलराज में धकेल दिए हैं। कुर्सी की लालच में दो नौसिखिए को अहम मंत्रालय का जिम्मा सौंप दिए हैं आदि आदि।
लेकिन इन सब से परे एक सच्चाई यह भी है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार विकास का एक नया पैमाना गढ़ा है और इन आंकड़ों को झुठलाया नहीं जा सकता है। विकास के इन्हीं अहम कार्यों में से एक है राज्य की आधी आबादी को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना। उन्हें एक नई पहचान देना। नीतीश कुमार पिछले एक दशक में महिलाओं को ध्यान में रख कर कई ऐसी योजनाएं लाए हैं जिसका लाभ राज्य की महिलाओं को मिल रहा है।
राज्य सरकार का हालिया निर्णय ‘राज्य के सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 फीसदी आरक्षण’ भी उसी में एक है। इससे न केवल राज्य में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को सशक्त होने में मदद मिलेगा बल्कि सरकारी दफ्तरों में महिलाओं की उपस्थिति भी बढ़ेगी। मौजूदा समय में राज्य के सरकारी दफतरों में महिला कर्मचारियों की उपस्थिति मात्र 9 फीसदी है। इससे पहले साल 2014 में नीतीश कुमार बिहार पुलिस में महिलाओं के लिए 35 फीसदी सीटों के आरक्षण का एलान चुके हैं।
बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है जहां पंचायत स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित है। साल 2013 में जब नीतीश कुमार ने इसका एलान किया था तो समूचे देश में नीतीश कुमार के इस फैसले की सराहना की गई थी। इससे न केवल राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी बल्कि वह अपने राजनीतिक अधिकार को भी जानने लगी।
इसी का नतीजा है कि आज राज्य की राजनीति में महिलाएं बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगीं। महिलाओं की राजनीतिक दिलचस्पी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में पुरुषों से ज्यादा संख्या में महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमला किया। पूरे राज्य में 46 फीसदी महिला मतदाताओं में से 60.57 फीसदी महिलाओं ने अपने इस मौलिक अधिकार का इस्तेमाल किया। पांच चरणों में संपन्न हुए इस चुनाव में हर चरण में महिलाओं की औसतन भागीदारी पुरुषों से 4-5 फीसदी अधिक रही।
देश में सबसे अधिक महिला विधायक होने का सौभाग्य भी बिहार विधानसभा को प्राप्त हो चुका है। साल 2010 में 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 34 महिला विधायक थीं। हालांकि 2015 में यह आंकड़ा घटकर 28 रह गया है।
मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना, अक्षर आंचल योजना, मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना आदि कई कल्यानकारी योजनाएं चलाकर नीतीश कुमार ने राज्य में अब तक सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं की तस्वीर बदल दी है।
साल 2001-11 के दौरान बिहार में महिलाओं के शिक्षा दर में 20 फीसदी का इजाफा हुआ है। मौजूदा समय में बिहार में शिक्षित महिलाओं की संख्या 53 फीसदी है। हालांकि यह अभी भी राष्ट्रीय औसत 65.5 फीसदी से काफी कम है। महिलाओं की शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ाने में मुफ्त साइकिल योजना, मुफ्त पोषाक, किताब योजना, मिड डे मिल और कस्तुरबा गांधी कन्या विद्यालय जैसी योजनाओं ने काफी अहम भूमिका अदा किया है।
साइकिल के कारण अब लड़कियां पढ़ाई के लिए घर से बाहर निकलने लगी हैं। एक समय में प्राथमिक शिक्षा के बाद परिवारवालों के दबाव के कारण पढ़ाई छोड़ देने वाली लड़कियां आज साइकिल के साहरे मिलों दूर जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। पिछले तीन साल में 174.36 करोड़ रुपए की खर्च से राज्य सरकार ने 8.7 लाख लड़कियों को साइकिल की मालकिन बनाया है।शिक्षा के साथ-साथ महिलाओं में जागरुकता भी बढ़ी है। कन्या भ्रूण हत्या के लिए कभी बदनाम रहे बिहार में बड़ी तेजी के साथ इसमें कमी दर्ज की गई है। पिछले तीन सालों में कन्या भ्रूण हत्य में 40 फीसदी की कमी देखी गई है।
सरकारी नौकरियों के अलावा सेल्फ हेल्प ग्रुप के माध्यम से सरकार ग्रामिण महिलाओं को भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है। एनजीओ की मदद से सरकार पहले अपने खर्चे पर इन्हें सिलाई, कटाई, बुनाई, कढ़ाई, पेंटिंग आदि का ट्रेनिंग दे रही है फिर अपना रोजगार खड़ा करने के लिए इन्हें 2 साल के लिए ब्याज मुक्त लोन मुहैया करा रही है। इसका असर खेतों में काम करने वाले मजदूरों में आने वाली कमी में साफ तौर पर देखा जा सकता है। पिछले तीन सालों में खेतों में काम करने वाले मजदूरों में 30 फीसदी की कमी आई है।
ये अलग बात है कि आज भी महिलाएं पूरी तौर पर आत्मनिर्भर नहीं हो पाई है। चुनाव भले वह जीत जाती हैं लेकिन इलाके का असली प्रतिनिधित्व उनके पति ही करते हैं। लेकिन इन योजनाओं का इतना असर तो जरूर पड़ा है कि अब तक चौका(किचन) के दायरे में सीमित रहने वाली औरतें वहां से निकल कर बाहर आ रही है और अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रही है। अभी तक लड़कों के ताने सुनने वाली लड़कियां लड़कों के साथ कदम से कदम मिला रही हैं, अब तक साइकिल के पीछे या आगे बैठने वाली लड़कियां अब उनके साथ साइकिल का रेस लगा रही है।
लेकिन इन सब से परे एक सच्चाई यह भी है कि नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार विकास का एक नया पैमाना गढ़ा है और इन आंकड़ों को झुठलाया नहीं जा सकता है। विकास के इन्हीं अहम कार्यों में से एक है राज्य की आधी आबादी को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना। उन्हें एक नई पहचान देना। नीतीश कुमार पिछले एक दशक में महिलाओं को ध्यान में रख कर कई ऐसी योजनाएं लाए हैं जिसका लाभ राज्य की महिलाओं को मिल रहा है।
राज्य सरकार का हालिया निर्णय ‘राज्य के सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 फीसदी आरक्षण’ भी उसी में एक है। इससे न केवल राज्य में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को सशक्त होने में मदद मिलेगा बल्कि सरकारी दफ्तरों में महिलाओं की उपस्थिति भी बढ़ेगी। मौजूदा समय में राज्य के सरकारी दफतरों में महिला कर्मचारियों की उपस्थिति मात्र 9 फीसदी है। इससे पहले साल 2014 में नीतीश कुमार बिहार पुलिस में महिलाओं के लिए 35 फीसदी सीटों के आरक्षण का एलान चुके हैं।
बिहार देश का पहला ऐसा राज्य है जहां पंचायत स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें आरक्षित है। साल 2013 में जब नीतीश कुमार ने इसका एलान किया था तो समूचे देश में नीतीश कुमार के इस फैसले की सराहना की गई थी। इससे न केवल राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी बल्कि वह अपने राजनीतिक अधिकार को भी जानने लगी।
इसी का नतीजा है कि आज राज्य की राजनीति में महिलाएं बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगीं। महिलाओं की राजनीतिक दिलचस्पी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में पुरुषों से ज्यादा संख्या में महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमला किया। पूरे राज्य में 46 फीसदी महिला मतदाताओं में से 60.57 फीसदी महिलाओं ने अपने इस मौलिक अधिकार का इस्तेमाल किया। पांच चरणों में संपन्न हुए इस चुनाव में हर चरण में महिलाओं की औसतन भागीदारी पुरुषों से 4-5 फीसदी अधिक रही।
देश में सबसे अधिक महिला विधायक होने का सौभाग्य भी बिहार विधानसभा को प्राप्त हो चुका है। साल 2010 में 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 34 महिला विधायक थीं। हालांकि 2015 में यह आंकड़ा घटकर 28 रह गया है।
मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना, अक्षर आंचल योजना, मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना आदि कई कल्यानकारी योजनाएं चलाकर नीतीश कुमार ने राज्य में अब तक सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं की तस्वीर बदल दी है।
साल 2001-11 के दौरान बिहार में महिलाओं के शिक्षा दर में 20 फीसदी का इजाफा हुआ है। मौजूदा समय में बिहार में शिक्षित महिलाओं की संख्या 53 फीसदी है। हालांकि यह अभी भी राष्ट्रीय औसत 65.5 फीसदी से काफी कम है। महिलाओं की शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ाने में मुफ्त साइकिल योजना, मुफ्त पोषाक, किताब योजना, मिड डे मिल और कस्तुरबा गांधी कन्या विद्यालय जैसी योजनाओं ने काफी अहम भूमिका अदा किया है।
साइकिल के कारण अब लड़कियां पढ़ाई के लिए घर से बाहर निकलने लगी हैं। एक समय में प्राथमिक शिक्षा के बाद परिवारवालों के दबाव के कारण पढ़ाई छोड़ देने वाली लड़कियां आज साइकिल के साहरे मिलों दूर जाकर अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है। पिछले तीन साल में 174.36 करोड़ रुपए की खर्च से राज्य सरकार ने 8.7 लाख लड़कियों को साइकिल की मालकिन बनाया है।शिक्षा के साथ-साथ महिलाओं में जागरुकता भी बढ़ी है। कन्या भ्रूण हत्या के लिए कभी बदनाम रहे बिहार में बड़ी तेजी के साथ इसमें कमी दर्ज की गई है। पिछले तीन सालों में कन्या भ्रूण हत्य में 40 फीसदी की कमी देखी गई है।
सरकारी नौकरियों के अलावा सेल्फ हेल्प ग्रुप के माध्यम से सरकार ग्रामिण महिलाओं को भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है। एनजीओ की मदद से सरकार पहले अपने खर्चे पर इन्हें सिलाई, कटाई, बुनाई, कढ़ाई, पेंटिंग आदि का ट्रेनिंग दे रही है फिर अपना रोजगार खड़ा करने के लिए इन्हें 2 साल के लिए ब्याज मुक्त लोन मुहैया करा रही है। इसका असर खेतों में काम करने वाले मजदूरों में आने वाली कमी में साफ तौर पर देखा जा सकता है। पिछले तीन सालों में खेतों में काम करने वाले मजदूरों में 30 फीसदी की कमी आई है।
ये अलग बात है कि आज भी महिलाएं पूरी तौर पर आत्मनिर्भर नहीं हो पाई है। चुनाव भले वह जीत जाती हैं लेकिन इलाके का असली प्रतिनिधित्व उनके पति ही करते हैं। लेकिन इन योजनाओं का इतना असर तो जरूर पड़ा है कि अब तक चौका(किचन) के दायरे में सीमित रहने वाली औरतें वहां से निकल कर बाहर आ रही है और अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर रही है। अभी तक लड़कों के ताने सुनने वाली लड़कियां लड़कों के साथ कदम से कदम मिला रही हैं, अब तक साइकिल के पीछे या आगे बैठने वाली लड़कियां अब उनके साथ साइकिल का रेस लगा रही है।




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