31 मई 2016, सेल के बनाए शहर बोकारो से पहली बार मेरा राफ्ता हुआ था. जेठ की दुपहरी में ढ़ेर सारी उम्मीदें और मन में थोड़ी घबराहट के साथ यहां कदम रखा था. पास में कुल जमा 10 महीने का अनुभव था. वह भी डेस्क का. मेन स्ट्रीम से इतर.ख्वाहिश थी पत्रकारिता को उसके सबसे नीचले पायदान से जानने और समझने की. एथिक्स का जो ककहरा पूरे चार सालों में पढ़ा था उसे हर स्तर पर समझना चाहता था. इसीलिए भैयाजी के मना करने और तनख्वाह भी अपने समकक्षों से कम होने के बाद भी दिल्ली को छोड़ बोकारो आना स्वीकार किया था.
कभी रिपोर्टिंग नहीं किया था. प्रॉपर्टी टाइम्स के लिए लिखते वक्त किसी से बात भी करनी होती थी तो फोन से ही काम चल जाता था. बिलकुल नया चैलेंज, नए लोग एक ऐसे शहर में जहां मेरा क्या मेरे खानदान में किसी का ताल्लुकात नहीं था.
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| जब दिल्ली से बोकारो के लिए निकल रहा था |
अच्छे से याद है जब पहली दफा मैं बोकारो समाहरणालय में यहां के डीसी राय महमापत रे से मिलने गया था. नीचे से उपर तक कांप रहा था. डर के मारे मेरी आवाज नहीं निकल रही थी. आज सर से हर मुद्दे पर बेझिझक बात करता हूं. बिना किसी डर के. जिस जिला शिक्षा पदाधिकारी से मेरा परिचय उनसे पांच फिट की दूरी से कराया गया था वो मुझे आज अपने बेटे की तरह मानते हैं(इसे बस एक रिश्ता माना जाय.बात जब खबर की होती है तो कोई रिश्ता नहीं) ऐसे कई नाम हैं. उनमें एक आद्रा रेल मंडल के वरीय वाणिज्य प्रबंधक भास्कर सर भी हैं .इन्हें जब कॉल किया था तो मुंह से सवाल नहीं निकल रहे थे. इनसे ही रेलवे का सबकुछ जाना. बिलकुल आसान नहीं था एक अंजान शहर में ऑफिस से 15 किलोमीटर दूर स्थित स्टेशन की हर खबर को बिना मिसिंग के लिखना. और तब जब आप रेलवे के आर से भी परिचित न हों. इन लोगों को शायद ही कभी भूलूं...
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| बोकारो भास्कर का न्यूज रूम |
कितनी बाइलाइन मिली गिना नहीं लेकिन इस बाइलान के लिए जो संघर्ष किया उसने पत्रकारिता के प्रति मेरे प्यार को और प्रगाढ़ कर दिया. नगर निगम के कार्यपालक पदाधिकारी का कांड हो, निगम के हाइटेक पार्क की खबर के बाद उड़ाई गई अफवाह हो, रेलवे की लोहाचोरी वाली खबर के बाद मिलने वाली धमकी हो या फिर मुहमांगे पैसे के ऑफर रहे हों. इन सभी घटनाओं ने जो शिक्षा मुझे दी है वह मैं कहीं और नहीं सीख पाता. इन्हीं बाइलाइन में से एक थी कैशलेस वाली खबर. जिसके कारण एक साल के करियर में ही मुझे सम्मान मिला. स्टेट लेवल की मीटिंग में जिस खबर पर चर्चा हुई .
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| मेरी पहली बाइलाइन |
एक साल में कई उतार-चढ़ाव देखा हूं. खुशी और गम के कई मौके आए. जिंदगी की सचाइयों को करीब से यहीं जाना हूं. पत्रकारिता का जो प्यार बभनबीघा से शुरू हुआ, दिल्ली में उसका रंग गहरा हुआ. बोकारो में वह प्रगाढ़ हो गया. कह सकते हैं इन एक सालों में बोकारो ने उसे पंख दिया है.
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| खबर जिसे लिखने पर सम्मान मिला |
दिल्ली तुम न केवल पत्रकारों की चाहत हो, मेरी तो जान भी हो.आखिर में तुम्हारे ही गोद में आना है. तुम तक आने से पहले पत्रकारिता के हर स्वरूप को जान लेना चाहता हूं. यह पहला पायदान था. बाद बाकी कोशिश जारी है और जारी रहेगी. तुम तक आने की तुम में समा जाने की. बाद बाकी किशोर से जवान तुम्ही ने किया है..
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| रिपोर्टिंग के दौरान ली गई तस्वीर |
आखिर में जावेद अख्तर साहब के एक गीत की दो पंक्ति-
लिये सपने निगाहों में,
चला हूं तेरी राहों में
उम्मीदों के दीये लेकर.
जिंदगी आ रहा हूं मैं....
🙏
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