मां के नाम एक ख़त...

मेरी प्यारी मां,
मां, आपको पता है आज मदर्स डे है.  भला आपको कैसे पता होगा.  आप अपने बेटे की तरह शहर में थोड़े रहती हो जो दिखावे की दुनिया में जीता है. आप तो गांव की शुद्ध और सच्ची दुनिया में रहती हो. मां अब हमारा देश पश्चिमि यानी विदेशी यभ्यता,  कल्चर, संस्कृति को अपना रहा है.

इसकी कुछ चीजें अच्छी है मां.  कुछ बेहद ही बुरी. एकदम से भद्दी. अब बोलिए न लोगों को मदर्स डे भी मनाने की जरूरत पड़ गई. क्या एक बेटे को अपनी मां के लिए किसी खास दिन की जरूरत है मां. क्या मां के होने का उत्सव साल में केवल एक दिन मनाया जा सकता है. क्या मां न्यू ईयर की भांति होती है जो 31 दिसंबर की आधी रात से शुरू रोती है 2 जनवरी होते ही समाप्त.

मां तो प्रकृति से प्रदत्त वो अनमोल उपहार है जिसकी न किसी से तुलना की जा सकती है और न ही उसे किसी खास दिन में समेटा जा सकता है. मां तो केवल प्यार की जा सकती है. अनंत, असीम प्यार.जितना भी कर लो वो स्नेह कम ही है.

इन शहरियों की तरह आपका बेटा भी अब शहरी हो गया है मां.  देखिए न तभी तो मदर्स डे पर ही आपको ये खत लिख रहा. हां मां,  जब हम एक समाज का हिस्सा होते हैं न तो कुछ हद तक हमें भी उनके अनुरूप चीजें एक्सेप्ट करनी होती है. लेकिन ये सोच कर घबराइएगा नहीं. आपका बेटा शहरी जरूर बना है.  लेकिन संस्कार नहीं खोया है. अभी भी वो इसके अंदर कूट-कूट कर भरा है जो आपने बचपन में सीखाया है.

मां थोड़ी गाली मुंह से निकलने लगी है, लेकिन पता है, जब भी अपने से बड़ों को गाली देता हूं आपका वो थप्पड़ याद आ जाता है.मैं आज भी आपका वही शंभु हूं जिसे आपने आठ साल पहले खुद से जुदा किया था. हां थोड़ी दाढ़ी बढ गई है और मूंछे भी.

मां आपकी डांट, कभी-कभी आपकी मार को बहुत मिस करता हूं.  क्योंकि अब रुलाने के बाद कोई पुचकारने नहीं आता मां.  खुद ही रोता हूं और खुद ही चुप हो जाता हूं. अब आपका बेटा लड़ना भी सीख रहा है. इंसानों की लड़ाई नहीं मां,  जिंदगी की लड़ाई. एक साल हो गया भैया जी से अलग हुए धीरे-धीरे ही सही खुद के लिए अच्छी और बुरी चीजों को समझने लगा हूं. अब तो भैया जी (Amar Nath) भी बोलने लगे हैं शंभू अब तुम समझदार होने लगे हो. मां अभी लंबा सफर तय करना है.

 भला आपका भी कोई आभार कर सकता है क्या लेकिन मुनव्वर राना मां की भावनाओं को बिलकुल जीवंत रूप से कलमबद्ध करते हैं मां, उन्हीं की पंक्ति आखिर में आपके लिए कहना चाहता हूं कि
अब भी चलती है जब आंधी कभी गम की,
मां की ममता मुझे बांहों में छुपा लेती है.
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
मां जब भी गुस्से में होती है रो देती है
                   आपका
                   शंभू बाबू..

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

मुख्यमंत्री जी, मोरहाबादी की खूबसूरती पर यूं दाग न लगने दीजिए...

रुचि

गुरविंदर कौर