अमीरों की मतलबपरस्ती ने गीता की दुनिया वीरान कर दी

घटना बोकारो के बगल मेें बसा चास की है। यहां दबंग के कटर मिल की दरकी हुई दीवार ने 21 नवंबर की दोपहर गरीब गीता की दुनिया उजाड़ दी। अब सुबह वह किसे स्कूल छोड़ने जाएगी। दोपहर आने का किसका राह देखेगी। रात में किसे किस्से सुनाएगी। कोई दुलार से उसे मां भी तो नहीं पुकारेगा। ये सारे गम उसे उस वक्त खाए जा रहे थे। अमीरों की अपनी मतलबपरस्ती ने हमेशा के लिए उस महिाल की गोद सूनी कर दी।मलवे से दबी लक्ष्मी(गीता की दस वर्षीय बेटी) का केवल चेहरा दिख रहा था। एकदम डरावना सा था वह मंजर। वहां आने वाले हर लोग उसे देख कर सहम जा रहे थे।


पर मां तो अपनी बेटी की आवाज सुनना चाह रही थी। अभी-अभी तो स्कूल से आई थी उसकी लाडली। सही से कपड़े भी कहां बदली थी। मां शायद अपनी दुलारी के लिए खाना निकाल रही थी। वह कैसे यकीं करे कि इतनी मनन्त  अब उसकी बेटी हमेशा के लिए खामोश हो गई। वह बेसुध होकर उसे तलाशती रही। कभी इस कोने जाती तो कभी उस कोने। पागल सी चिल्लाती...आई जो हामर लक्ष्मी बेटी कहां चली गेले। गिरी दीवार पर डंडे पटकती। मलवे को हटाने की कोशिश करती। उस पर कान लगा बिटिया की सिसकियां सुनना चाहती।



 पति की बांहों में लिपट कर बेहोश हो जाती। होश आते ही जानने वालों के पैरों पर गिर जाती। बेटी को निकालने की गुहार लगाती। आधे घंटे बाद लोग उसकी बेटी को मलवे से निकाल उसके आंखों के सामने पुलिस की सफेद सफारी गाड़ी में लोड कर भेज दिए। वह बस चिघाड़ती रह गई। उसकी दुनिया उसके सामने मिट गई।

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