तीन सहेलियां
रविवार का दिन, दोपहर अपने आखिरी पड़ाव पर था। तीन
से ज्यादा का समय बीत चुका था। पूस के शाम की सर्द हवा अपने रफ्तार में बह रही थी। इस पल टैगोर हिल पार्क के 340 सीढ़ी उंचे बने चबूतरे पर समय बीताने का अपना ही सुख
था। हर उम्र के लोग इस सुख का आनंद ले रहे थे। ज्यादातर यहां से दिखने वाले रांची शहर
के मनोरम दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे। कुछ सेल्फी तो कुछ अपने
फैमिली फोटोग्राफी में व्यस्त थे। एक-दो जस्ट मैरेड कपल भी थे जो अपनी इस अवस्था को अलग-अलग
पोज के साथ जाहिर कर रहे थे।
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| टैगोर हिल पार्क से रांची शहर का नजारा |
इसी दौरान वहां तीन सहेलियों का आगमन हुआ। हमउम्र ही
थीं, तीनों सामान लंबाई की भी थीं। चबूतरे का एक दो राउंड लगाकर। 10-12 सेल्फियां
निकालकर वे वहां के सबसे उंचे पत्थर पर जा बैठीं। वहां जाते ही तीनों अपनी दुनियां
में खो गईं। उन्हें इस बात का तनिक भी फिक्र नहीं रहा कि वे एक सार्वजनिक स्थान पर
बैठीं हैं जहां उनकी बातें आसपास के लोग भी सुन रहे हैं। इसकी परवाह किए बिना वे बेधड़क अपनी बातें साझा किए
जा रहीं थीं। बातें अपने कॉलेज के सुनहरे दिनों की। बातें अपनी पाबंदियों की। बातें
मन में हिलकोरे मार रहे ख्यालों की। बातें दुनिया जहान की।
अपने शादी के बाद अपनी
चाहत को बयां करते हुए एक कहती है...
यार एक लड़की अपने पति से क्या
उम्मीद करती है। बस हर दिन कम से कम एक घंटे वह उसके साथ बिताए। मत ले जाए मूवी हॉल।
घर वाले टीवी पर ही एक घंटे साथ में बैठ कर देख ले। सहमति जताते हुए दूसरी कहती है, हां यार अपने पति से इतनी चाहत तो कर ही
सकते हैं। इतने में तीसरी बोलती है लेकिन यहां लोगों को पत्नी नहीं
नौकरानी चाहिए। अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती है, मुझे देखने आए थे।
पूछ रहे थे खाना बना लेती हो। मैंने जब हां कहा तो कहते हैं चिकन भी बना लेती
हो ! इस पर तीनों एक साथ
हंस पड़ती है। भला तीसरी चुप क्यों रहती। बात आगे बढाते हुए वह कहती है, शादी के बाद एक-दूसरे को समझने के लिए छह महीने का समय तो कम से कम चाहिए ही।
अचानक तीनों एक साथ शांत हो जाती हैं।
इनकी खामोशी खत्म होती है कॉलेज
के दिनों की याद से। कहती हैं सबसे ज्यादा मजे तो कॉलेज के दिनों में ही होते हैं
यार। इस पर एक असहमति जताते हुए कहती है नहीं यार हम सिंगल रह के इस उम्र में भी एंजव्वाय कर सकते हैं। फलां को देखो सिंगल है। फिर भी पब, क्लब, डिस्को हर जगह
जाती है। मजे करती है। किसी के भरोसे नहीं है। अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी रही हैं।
दोनों इस पर सहमत होती हैं। इनकी बातों का सिलसिला जारी रहता है।
वहां से गुजरने वाले लोग उन्हें देखते हैं। घूरते हैं। लेकिन उनके उपर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे टैगोर हिल पार्क के सबसे उंचे स्थान पर अपनी सबसे हसीन पलों में खो कर अपने सपने बुनने में व्यस्त रहती हैं। कितना कुछ बयां कर रहा है शादी की दहलीज पर जा पहुंची इन तीन किशोरियों की गुफ्तगु। इस पर आप खुद ही चिंतन कीजिये।
वहां से गुजरने वाले लोग उन्हें देखते हैं। घूरते हैं। लेकिन उनके उपर कोई फर्क नहीं पड़ता है। वे टैगोर हिल पार्क के सबसे उंचे स्थान पर अपनी सबसे हसीन पलों में खो कर अपने सपने बुनने में व्यस्त रहती हैं। कितना कुछ बयां कर रहा है शादी की दहलीज पर जा पहुंची इन तीन किशोरियों की गुफ्तगु। इस पर आप खुद ही चिंतन कीजिये।

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