रांची:अव्यवस्थित तरीके से बसा एक शहर जिसकी फिजा में प्यार पसरा है

रांची यानी प्रकृति की गोद में अव्यवस्थित तरीके से बसा एक शहर। एक शहर जिसका मिजाज दिन की हर बेला में अपना रंग बदलता है। पहाड़ों, जंगलों, झरनों और उद्योगों(छोटे व मंझोले) के बीच विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और संप्रदायों का संगम स्थल। इसके अलावा भी इसे अलग-अलग शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है। हर किसी की अपनी नजर है और अपनी समझ भी। मैंने रांची को कुछ ऐसे ही देखा है।
टैगोर हिल से रांची शहर
महीना अप्रैल का था और तारीख दूसरे सप्ताह की कोई एक होगी। वर्ष 2016 था। झारखंड स्वर्ण जयंती एक्सप्रेस लगभग 30 घंटे की यात्रा के बाद मुझे देश की राजधानी से इस शहर में लेकर आई थी। दिल में पीड़ा और मन में घबराहट, बेचैनी छटपटाहट थी। सपनों का शहर छूट रहा था। पास वो आ रहा था जिसकी ख्वाहिश कभी नहीं की गई थी। जिससे पीढ़ियों से नाता नहीं रहा है।
 
रांची शहर का दृश्य
...और मैंने शहर को ही महबूब मान लिया
लालपुर का लोअर वर्धमान कंपाउड। यहां के कोयला विहार अपार्टमेंट का चौथा फ्लोर। रांची का यह पहला ठिकाना था।जैसे-जैसे दिन ढलता गया, मैं इस शहर की आगोश में खोता चला गया। उस रोज की सुबह सिहरन के साथ शुरू हुई थी। दिन चढ़ता गया। गर्माहट बढ़ती गई। दोपहर बीतते ही आसमान ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया। सूरज से बादल अठखेलियां शुरू कर दिया। और देखते ही मौसम ने कुछ यूं रंग बदला कि जुवां लता दी का गाया गीत मौसम है आशिकाना... ऐ दिल कहीं से उनको ऐसे में ढूंढ लाना... गुनगुनाने लगा। रांची की फिजा में प्यार पसरा है। बिन महबूब के यह शहर सूना है। तभी मैंने शहर को अपना महबूब मान लिया था।
                                                                     धुर्वा डैम का दृश्य
शहर के हर कोने की यात्रा का अपना सुख
शहर के हर कोने का अपना सुख है। चाहे वह घुमावदार सड़क और हजारों फीट नीचे उतारती पतरातु घाटी की यात्रा हो या रिंग रोड पर लॉन्ग ड्राइव का आनंद। सैकड़ों फिट उंचे टैगोर हिल से दिखता समूचे शहर का शानदार दृश्य हो या कांके डैम में अपने बच्चों के साथ समय बीताते शहरवासी। शहर के बाहरी हिस्से के एक कोने में है धुर्वा डैम। वहां पहुंचते ही जेहन में मुंबई के मरीन ड्राइव की तस्वीरें उभर आती हैं। हां इसका पानी सेकेंड दर सेकेंड उफान नहीं मारता लेकिन हवा से पानी पर बनने वाली लहरें और उसके कलकल की आवाज कानों को सुकून देती है।
रामनवमी जुलूस का नज़ारा
गंगा जमुनी से भी ऊपर है यहां की तहज़ीब
मौसम और वादियों से इतर यहां त्याहारों के मनाने का अंदाज भी इस शहर का हो जाने को करता है। रांची की तहज़ीब गंगा-जमुनी से भी ऊपर की है। यहां  रामनवमी की रैली हो या सरहुल(प्रकृति पर्व) का जुलूस या फर मुहर्रम की तजिया यात्रा। हर पर्व को यहां के लोग हर्षोल्लास से मनाते हैं।
सरहुल का उल्लास


खूबसूरती को डस रहे कंक्रीट के जंगल
डर इस बात का है अगर प्रकृति प्रदत इस खूबसरती को सेहजा नहीं गया तो रफ्ता-रफ्ता यह बर्बाद हो जाएगा। जिस रफ्तार से रांची के ईर्द-गिर्द बसे पेड-पौधों के जंगल क्रंकीट के जंगल में तब्दील हो रहे हैं। शहर की आवादी बढ़ रही है। जिस तरीके से अव्यवस्था और वैमन्यस्ता फैल रही है अगर समय रहते इसे दुरुस्त नहीं किया गया तो प्यारा सा शहर एक महानगर और स्मार्ट सिटी तो जरूर होगा लेकिन हर अजनबी को यहां आते ही यहां की फिजा से मोहब्बत नहीं होगी । कोई इसे अपना महबूब नहीं कहेगा।
सिटी के पास जांगल जो अब सिमट रहा

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