देहाती की होली...
होली हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। यह चैत्र मास के पहले दिन मनाया जाता है। इस रोज से हिन्दू नववर्ष की भी शुरुआत होती है। इसमें हम अपने दोस्तों को रंग-गुलाल लगाते हैं। इस दिन घरों में अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट व्यंजन भी बनते हैं। स्कूल में सतीश सर किसी भी पर्व में छुट्टी से पहले लेख जरूर लिखवाते थे। लगभग उन तमाम लेखों में उक्त बातें एक सी ही होती थी। दीपावली में रंग की जगह दीया जला देते थे और दशहरा में मेला घूम आते थे। उम्र के साथ यह अहसास हुआ कि होली तो जीवनरूपी रंग का इंद्रधनुष है। इसमें रंग है एकता का, सौहार्द्र का, भाईचारे का, रिश्ते का, गोतियारे का, दोस्ती का।
इसमें जब मुखिया बाबा की होलिका की टोली में हम सब गाँव भ्रमण पर पर निकलते थे तब गुरु महाराज भी हमें आशीर्वाद देते हैं, गणेश ठाकुर चाचा भी ललाट में मिट्टी लपेस्ते हैं। झपसू मियां के घर के पास भी हमारा स्वागत होता है और अशोक लाल के दालान में भी होली की गीतों के साथ सिगरेट के धुएं व सौंफ चबाया जाता है। होली का यह सुख अतुलनीय है।
यही कारण रहा कि बचपन में पापा हर चीज से मना करते थे लेकिन उन्होंने कभी इस टोली में शामिल होने से नहीं रोका। इस सुख के बाद फ्लैट वाली होली कभी नहीं भाई। इसके उत्साह की सीमा यह होटी थी कि हम एक महीने पहले ही पुरानी बनियान और टीशर्ट टेब लेते थे कि किसे पहन कर इसमें शामिल होना है। किसकी मजाल की वह सही कपड़े में घर लौट आये उस दोपहरी। कीचड़ में लोटाने से पहिले मामला इसका सेट किया जाता था कि किस छेद को चुन कर किसका कपड़ा फाड़ना है।
समय के साथ स्थितियां बदलती गयी। मुखिया बाबा हमारे बीच नहीं रहे। वह इस टोली के रीढ़ थे। वे थे तब अनुशासन था। वे पुल थे बुजुर्ग, बच्चे, युवा और अधेड़ के बीच के। उनके जाने के बाद लगने लगा अब गाँव में मंडली नहीं घूमेंगी। परंपरा टूट जाएगा। अब गाँव वाले दामाद का कोई फक्कड़ से स्वागत नहीं करेगा। सड़कों पर होली के गीत नहीं गूंजेगी। न चाची, भाभी छत से रंग और कीचड़ फेकेंगी और न ही नीचे से मजाक नहैं करेगा। जोर से बच्चे नहीं चिल्लायेंगे की बुरा न मानो होली है। पिछले कुछ वर्षों से चीजें होती तो थी लेकिन फीकी।
इस बार ब्रजेश दा की टोली ने तेजी से आकार लेते इस एकांत रूपी सूनेपन को अपने हुनर से भर दिया। फाड़ा में ढोलक कस के जब उन्होंने इस पर थाप दिया तो बच्चे बूढ़े जवान एकबार फिर फागुन में मस्त हो गए और गलियों में गूंजने लगा कि फागुन के मल्लिका मालिके है... शिवालय में शिव जी के लिए, ठाकुरवाड़ी में श्याम के लिए देवी स्थान में माता के लिए फाग गया तो गलियों में गूंजा तोरो जवानी बेकार गोरिया.. तोरो जवानी बेकार गे....
रविकिशोर चा अपने सदाबहार रंग में लोटपोट किये, मृत्युंजय दा(मुत्तन मसत्साह) तकियाकलाम बने रहे कि तोरो नै होली पढ़े ऐलौ रे मुतना...झाल पकड़ के कुछ समां पिंकू चा ने बांधा तो हमारी उम्र के छोटे दा प्रशांत, मुरारी भैया, सूरज ने झाल, करताल थाम के इसमें जान डाल दी और बच्चों की टोली ने भीड़। चुन्नू दा और अशोक चा जैसे गार्जियन अनुशासन देख रहे थे तब हीरा दा और भैया जी जैसे लोग कमरिया हिला के लोगों का मनोरंजन किये। गली में चाची भाभी लोग रंग भी डाली और होली भी सुनीं।
बाद बाकी सन्नी, सोनू दा सब मिल के ठंढई में में सबको सुस्त करने का तगड़ा जुगाड़ भी सेट किये थे। कुल मिला के होली चौचक रही। बस गांव में होली का ये सदाबहार रंग सदा बरकरार रहे।



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