ये शेखपुरा है मेरी जान
बात
पिछले साल छठ पूजा की है। गांव
में युवाओं के कंधे पर एक खास
रंग का गमछा जगह बना रहा था । पीले रंग का यह गमछा तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। इसकी लोकप्रियता यहां की राजनीति के रंग को एक नया कलेवर दे रहा था। इस रंग का चयन
उनके नए-नवेले
नेता आशुतोष ने किया था। रंग
के साथ आशुतोष की आकांक्षाएं
भी तेजी से फैलती गई और अब वह
एक क्षेत्रीय पार्टी राष्ट्रीय
जन जन नामक पार्टी के मुखिया हैं। ये हुई स्थानीयता की बात।
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| शेखपुरा रेलवे स्टेशन। |
अब
जरा राष्ट्रीय रंग को यहां समझिए। शेखपुरा जिले के भाजपा जिलााध्यक्ष दारो बिंद। इन दिनों खूब सूर्खियों बटोर रहे हैं। कारण है उनका उत्साह। वे इस बात से गदगद हैं कि अगड़ाबाहुल जिले में बाभन को चित्त कर वे जिलाध्यक्ष बने हैं। इस खुशी में वे खूब गरिया रहे हैं भूमिहार- बाभन को। उस जाति कि महिलाओं के किस्से भी लोगोंं को सुना रहे हैं। इन सबका एक ऑडियो भी फिजा में तैर रहा है (गुगल पर आसानी से उपलब्ध है)। लगभग 60 फीसदी भूमिहार और ब्राह्ण व अन्य अगड़ी जाति वाले इस जिले में भाजाप जिलाध्यक्ष की इस अपार खुशी से भाजपा की तैयारी को भी समझा जा सकता है।
इतिहास के पन्नों को पलटिएगा तो यहां के लोगों ने दिल खोलकर कांग्रेस पर प्यार लुटाया है। जिले में दो विधानसभा क्षेत्र है। शेखपुरा
और बरबीघा। 1951 से 2005 तक
कांग्रेस का यहां एकछत्र राज
रहा ।बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री
श्रीकृष्ण सिंह से लेकर महावीर चौधरी और अभी नीतीश के अहम
सिपहसालार अशोक चौधरी तक ने
यहां से अपने राजनीतिक सफर
की शुरुआत की। महावीर चौधरी
जिनका दूर-दूर
तक बरबीघा से कोई नाता नहीं
रहा वे लगभग दो दशक तक इस क्षेत्र
का प्रतिनिधित्व विधानसभा में किए। केवल कांग्रेस
पार्टी के नाम पर । जाते-जाते
अपने बेटे अशोक चौधरी को भी लांच कर गए ।
2005 में यहां की फिजा बदली। राज्य की राजनीति के साथ लोगों ने चुनाव चिन्ह और नेता का साथ भी बदला। भाजपा ने इसे जदयू के हवाले कर दिया और लोगों ने जदयू को अपना भरोसा दे दिया। ये विश्वास इतना दिलेरी भरा था कि लोगों ने कैंडिडेट की स्थानीयता और अन्य जरूरी योग्यता को दरकिनार कर केवल पार्टी को वोट दिया। हालांकि बरबीघा के लोगों का भरोसा 10 वर्षों में ही टूट गया और लोग अपने जड़ की ओर लौट गए। इसमें बाजी मार गए राजो बाबू के पोते सुदर्शन। ये जीत कांग्रेस से ज्यादा राजो बाबू के वंशज की थी।
83.68 फीसदी हिन्दू आबादी वाले इस जिले से भाजापा हमेशा कन्नी काटे रही है। गठबंधन में ये सीट हमेशा जदयू को सुपूर्द कर वह निश्चिंत रही है। जबकि जानकारों की मानें तो यहां सांगठनिक तौर पर जदयू से बेहतर भाजपा है। नतीजा जदयू भी
इसे अपना एकाधिकारी समझने
लगी और स्थानीय को दरकिनार
कर बाहरी नेताओं को लैंड कराते रही।
82.9 फीसदी ग्रामीण और 17.1 फीसदी शहरी क्षेत्र वाले इस क्षेत्र में
मौजूदा राजनीतिक हालात के
मद्देनजर अभी कोई भी पार्टी
यह दावा नहीं कर सकती कि इस पर
उनका अपना एकाधिकार है। कांग्रेस
लगभग अपनी जमीन खो चुकी है।
जदयू के कंधे पर हथियार रख कर
अगर भाजपा इसी तरह निश्चिंत
रही तो वह शेखपुरा ही नहीं
इसके आसपड़ोस के जिले से ही
अपना आधार खोएगी।
पार्टियों
को इस बात को समझना होगा कि 65 फीसदी लिट्रेसी रेट वाला यह शेखपुरा है मेरी जान। इनके मिजाज और मांग को नहीं समझे तो यहां राजो सिंह भी औधे मुंह गिर चुके हैं और कभी अपना एकछत्र राज समझने वाले अशोक चौधरी को यहां के लोगो ने इधर का रास्ता भूला दिया है।

Superb...or behtar ho sakta tha..
ReplyDeleteहां जरूर। आगे और बेहतर करने की कोशिश करेंगे
Deleteबढ़िया विश्लेषण
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