नाम के आगे उपसर्ग लगातीं सरकारें और उस पर हाईकोर्ट की ये टिप्पणी

भूख से मौत मामले की एक सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2021 को एक सख्त टिप्पणी की है। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ रविरंजन और जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की कोर्ट ने कहा-""झारखंड में आज भी यहां के लोगों को जंगली की तरह ट्रीट किया जाता है। बिरहोर समाज के लोग पत्ता खाने को मजबूर हैं। गैस चूल्हा, शौचालय और स्वच्छ पानी तक की भी कोई सुविधा नहीं मिल पा रही है। जबकि उनके ही जंगल से हम खनिज पदार्थ निकालते हैं। लेकिन उनका विकास नहीं हो पा रहा है।''

झारखंड हाईकोर्ट ने भूख से हुई मौत का स्वत: संज्ञान लिया है।

अदलात ने कहा-"यह शर्म की बात है कि अभी भी कई गांव के लोग लकड़ी बेचकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में यह राज्य सरकार के लिए सोचने की जरूरत है कि योजनाएं धरातल पर पहुंचे। कोर्ट ने कहा कि क्या राज्य सरकार गांव में चिकित्सा सुविधा, स्कूल, शुद्ध पीने का पानी, रसोई गैस जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं उपलब्ध करा सकती है।''

आज से 5 साल पहले ऐसी ही एक स्टोरी की तालाश में मैं बोकारो के गोमिया, ललपनिया के गांवों में घूमा था। वह गांव पूरी तरह बिरहोर जनजाति का था। गांव में एक बी मकान पक्का का नहीं। एख भी घर नहीं जिसमें सुराख नहीं। लकड़ी बेचकर और रस्सी बनाकर अपना जीवन-यापन करते थे। सेल कागजों पर दिखाने के लिए कुछ बच्चों को दस्तखत कराना जरूर सीखा दिया था लेकिन 10वीं पास एक भी व्यक्ति नहीं मिले। ये कहानी राज्य के हर कोने की है। बस शहर से थोड़ी दूर निकलिए कि आज भी महिलाएं चुआं से पानी ढोते मिल जाएंगी। 


2016 बिरहोर समुदाय पर ये स्टोरी मैंने दैनिक भास्कर के लिए की थी। 

 जिस राज्य में आज भी गरीबों के सिर पर छत न हो। खाने को अनाज न हो। पीने को शुद्ध पानी न हो उस राज्य के नाम के आगे अंग्रेजी के मोमेंटम, स्किल और इमर्जिंग जैसे उपसर्ग लगाना कितना जायज है इस पर विचार करने की जरूरत है। और हां एक बात जान लीजिए यहां तस्कर जानवर से ज्यादा यहां के बेटियों की तस्करी करते हैं।


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