आखिरी कॉल
तब वो आपको स्वीकार कर ली...।
कि बस ऐवें ही जस्ट ए फ्रेंड...।
बधाई हो आपको...।
शादी की डेट-वेट तो बताइएगा न...।
कि वो अभी नहीं बताइगा...।
मेरे सो कॉल्ड समकालीन फ्रेंड...।
अरे..अरे.. अरे.. कॉन्ग्राचुलेशन कहना तो भूल ही गई । इतना सबकुछ वो एक सांस में बोल गई थी।
फोन के इस पार वो बस सुनते रहा। नवंबर की गुलाबी ठंड में वो शहर की तफरीह करने निकला था। साप्ताहिक अवकाश था उसका। सर्द हवाओं के बीच एक के बाद एक बारूद के गोले के इस वार की उम्मीद कहां थी उसे।
फोन की घंटी बजने के बाद जब उसने स्क्रीन देखा तब सुकून से बतियाने का ठिकाना तलाशने में जुटा था। मस्त मौसम भी था और सुहानी शाम भी। चाय का ठीया भी ढंूढ़ लिया था वो। फोन के उस पार के तेवर ने उसकी सारी हसरतों पर मानों जैसे बुलडोजर चला दिया हो।
चंद सेकेंड के लिए दोनों ओर खामोशी थी। सड़क की सरपट भागती गाड़ियों के चें.. पों... के बीच भी चंद सेकेंड के लिए वो सन्न था। एकदम से शांत... ।
खामोशी क चीरते हुए एक झन्नाटेदार हमला फिर शुर हुआ। इस बार फर्राटेदार अंग्रेजी थी। आई वाज हर्ट...यू वाज आइडियल पर्सन फॉर मी.. यू आर सुपर्व... इतना के बाद फिर से वही सन्नाटा था।
वो समझ नहीं पा रहा था कि वो क्या रिप्लाई करे। वो डूब गया था उन वर्षों पुरानी बात में। तब न फेसबुक था, न व्हाट्सएप। फोन कॉल रिसिव करने के भी चार्ज लगा करते थे। दोनों के पास फोन भी कहां हुआ करता था। न ही वे इतने संपन्न थे कि STD बूथ में जाकर बातें किया करे। तब भी होती थी उनकी बातें।
तब कहां थी उन बातों में ये कड़वाहट... कुछ होता था तो इंतजार.... बिन मुद्दों के भी शाम गुजर जाया करती थीं। वो अभी इन सब यादों में तैैर ही रहा था कि उसकी खामोशी फिर टूटी।
आपने जो किया वो सही है...आपको खुद का भी सोचना चाहिए... गुड...। इस बार बोल्ड आवाज में एक भारीपन था। सिसकने की भी आवाज भी आई थी। वह कुछ बोलता इससे पहले ही फोन कट गया। ठंडी हवाओं के बीच वह पसीने से तर-बतर था। कुछ पल बैठा कि शायद फिर से फोन आएगा। दिन.. महीने...साल बीत गए। फोन नहीं आया।
#देहाती_की_कहानी

बढ़िया, समझ आया।
ReplyDeleteहमेशा की तरह अच्छा लिखें है |
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