क्या बीजेपी के खिलाफ मुहिम में अकेले पड़े नीतीश कुमार
बिहार में एनडीए से अलग होने के बाद सितंबर में नीतीश कुमार ने एक बाद एक 10 से ज्यादा पार्टी सुप्रीमो के साथ देशभर में बीजेपी के खिलाफ मोर्चा बनाने की मुहिम शुरू की। 10 से ज्यादा पार्टियों के सुप्रीमों के साथ इस पर मंत्रणा भी की। एंटी बीजेपी धड़ों को एकजुट करने की कोशिश की, लेकिन जिस गुट को एकजुट करने में नीतीश कुमार जुटे थे 6 महीने के भीतर अब वे उस मुहिम में अकेले पड़ते दिख रहे हैं।
कितने अकेले हो गए हैं उसे इसी से समझ लीजिए कि बीते बुधवार को हैदराबाद में विपक्षी दलों के नेताओं का महाजुटान हुआ। केजरीवाल से लेकर भगवंत मान तक पहुंचे। अखिलेश यादव भी पहुंचे। ममता दीदी को भी निमंत्रम मिला। लेकिन उसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निमंत्रण तक नहीं मिला।
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| 18 जनवरी को टीआरएस की हैदराबाद में रैली थी। इसमें अरविंद केजरीवाल, मुलायम सिंह यादव, पी विजयन, डी राजा समेत विपक्ष के सभी बड़े चेहरे शामिल हुए थे। |
वरिष्ठ पत्रकार और पॉलिटिकल एना अरविंद मोहन कहते हैं कि शुरुआती तेजी के बाद नीतीश कुमार अब अपने इस अभियान में शिथिल पड़ गए हैं। उनके सामने सिर मुंडवाते ही ओले पड़ने की स्थिति बन गई है। पहले तो उन्हें राष्ट्रीय फलक उन्हें तवज्जो नहीं मिली जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी। अब बिहार में उनके सहयोगी ही उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं।
इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव ने हैदराबाद में विपक्षी नेताओं का सम्मेलन आयोजित किया लेकिन उसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निमंत्रण तक नहीं मिला। हालांकि इसके जवाब में नीतीश कुमार ने कहा कि वे अभी बिहार में समाधान यात्रा निकाल रहे हैं कोई बुलाता भी तो वो नहीं जा पाते।
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| सितंबर में हरियाना में इनेलो की रैली हुई थी। इसमें नीतीश कुमार के साथ तेजस्वी और सुखवीर सिंह बादल शामिल हुए थे। |
राज्य में भले सहयोगी राजद के बड़े नेता नीतीश कुमार को केंद्र भेजने की बात कर रहे हैं लेकिन राजद के विधायक और प्रदेश स्तर के नेता लगातार नीतीश कुमार पर हमलावर हैं। इतना ही नहीं रामचरित मानस जैसे मुद्दे पर विवाद खड़ा कर सरकरा के लिए किरकिरी कर रहे हैं। ऐसे में अब चर्चा इस बात की शुरू होने लगी है कि क्या दिल्ली की कोशिश में नीतीश कुमार के हाथ से बिहार सरकने लग गया है।
नीतीश की राह में ये हैं रोड़े
1.बिहार में सरकार को स्थिर रखने के लिए महागठबंधन को एकजुट रखना
नीतीश कुमार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती बिहार में सरकार को स्थिर रखना हो गया है। महागठबंधन के बाद बिहार में तीन उपचुनाव हुए मोकामा, गोपालगंज और कुढ़नी। तीन में से दो सीट महागठबंधन के उम्मीदवार चुनाव हार गए। आरजेडी अपनी एक सीट मोकामा बचाने में कामयाब रही। उसमें भी पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार की चर्चा रही।
ऐसे में आरजेडी के एक खेमे में गठबंधन के लाभ-हानि की चर्चा भी होने लगी है। गाहे-बगाहे आरजेडी के नेता अपने स्टेटमेंट से भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। कुछ नेता तो सीधा नीतीश कुमार पर हमलावर हैं। आरजेडी के साथ जेडीयू के एक खेमे में भी नाराजगी की बात चल रही है। वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार कहते हैं कि नीतीश कुमार ऐसा कतई नहीं चाहेंगे कि दिल्ली के चक्कर में बिहार उनके हाथ से फिसल जाए।
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| नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाजवादी धड़ों को एकजुट करने की है। |
2. सभी समाजवादी दलों को एक छतरी के नीचे ला पाना
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार नीरजा चौधरी कहते हैं कि नीतीश कुमार उसी कोशिश में जुटे हैं जैसा 1988 में वीपी सिंह किए थे। वे सबसे पहले सभी समाजवादी धड़ों को एकजुट करके इसे विपक्ष का सेंटर पीस बनाना चाहते हैं। इसके बाद वे एंटी बीजेपी के दलों जिसमें ममता बनर्जी की टीएमसी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, महाराष्ट्र में शिवसे और दक्षिण में टीआरएस के चंद्रशेखर राव और जगनमोहन रेड्डी को साथ लाकर आखिर में कांग्रेस से समर्थन चाहते हैं।
लेकिन इसमें उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी देवेगौड़ा और अखिलेश को मनाना। दोनों अपने-अपने सूबे के बड़े क्षत्रप हैं और दोनों का फोकस एरिया फिलहाल अपना राज्य है। कर्नाटक में चुनाव भी होने हैं। जेडीएस विधानसभा चुनाव तक अपना पत्ता नहीं खोलेगा। अखिलेश यादव भी केंद्र से ज्यादा राज्य की राजनीति पर फोकस कर रहे हैं।
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| नीतीश कुमार 2013 से ही समाजवादी धड़ों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। |
3. विपक्षी दलों के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाना
विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के टक्कर का चेहरा देना। ऐसे में अगर नीतीश कुमार की बात करें तो इनकी छवि देश भर में एक ऐसे नेता की है जिनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं है। बिहार जैसे राज्य में 17 साल से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का अनुभव है। बिहार में कई बड़ी योजनाओं को शुरू करने का श्रेय भी इन्हें जाता है।
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहतेे हैं कि वो विपक्ष का मोस्ट एक्सेप्टेबल चेहरा हो सकते हैं लेकिन ये चुनाव से पहले इस पर एक राय बनाना ही सबसे मुश्किल होगा। इस पर वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार कहते हैं कि बार-बार अपना सहयोगी बदलने के कारण राजनीतिक दलों का उन पर विश्वास करना ही मुश्किल हो गया है। अच्छा शसन देने के बाद भी विधानसभा में उनकी सीटें लगातार घटी हैं ऐसे में विपक्षी दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता मुश्किल होगी।
4. कांग्रेस नहीं खोल रहा है अपने पत्ते
वहीं नीतीश कुमार के इस पूरे अभियान पर कांग्रेस पानी फेर सकती है। कांग्रेस अभी तक लोकसभा चुनाव को लेकर अपना पत्ता नहीं खोला है। सितंबर में नीतीश कुमार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से अलग-अलग मुलाकात किए थे। उस दौरान भी सोनिया गांधी ने इन्हें आश्वासन देने की बजाए नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के बाद उनसे मिलने की सलाह दी थी।
मल्लिकार्जुन खड़गे के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद इस मसले पर इनकी कोई चर्चा नहीं हुई है। वहीं भारत जोड़ो यात्रा की सफलता के बाद कांग्रेस अब राहुल गांधी को एक बार फिर से विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा प्रोजेक्ट करने में जुट गई है। ऐसे में नीतीश कुमार को यहां भी एक बड़ा झटका लग सकता है।
अब समझिए नीतीश कुमार की क्या है ताकत
यूपी-बिहार और झारखंड में अपने दम पर कर सकते हैं बड़ा खेला
जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह का दावा है कि वे लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 40 से ज्यादा सीटों का नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस पर वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं कि बिहार के अलावा, यूपी, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात में बड़ी संख्या में कुर्मी वोटर्स हैं, जिसके नेतृत्व का दावा नीतीश कुमार करते हैं।
UP में सपा नेता बेनीप्रसाद वर्मा और अपना दल के सोनीलाल पटेल के बाद कुर्मी समाज से कोई बड़ा चेहरा किसी भी पार्टी के पास नहीं है। BJP सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल के सहारे कुर्मी समाज को साधे हुए है, जबकि देश में कुर्मी नेता के तौर पर नीतीश कुमार खुद को स्थापित कर चुके हैं। ऐसे में नीतीश कुमार बिहार और यूपी में बीजेपी का खेल बिगाड़ सकते हैं। कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता यूपी और बिहार होकर ही जाता है।
बिहार में नीतीश जिस दल के साथ रहे उनकी सीटें बढ़ी है
विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि नीतीश कुमार के साथ जाने वाली पार्टियों के वोट शेयर भले नहीं बढ़े, लेकिन सीटों में भारी इजाफा होता है। 2015 में नीतीश कुमार ने लालू यादव और कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा।
तब महागठबंधन (JDU+RJD+कांग्रेस) को 41.84% वोट मिला और सीटें 178 पहुंच गईं। वहीं, NDA 34.59% वोट पाकर 58 सीट पर सिमट गई, लेकिन 2020 में जैसे ही BJP ने नीतीश कुमार से हाथ मिलाया NDA 37.26% वोट शेयर के साथ 125 सीट जीतने में कामयाब रही। जबकि, महागठबंधन की 15 सीटें कम हो गईं।
इन नेताओं के साथ मंत्रणा कर सहमति बनाने की हुई थी कोशिश
बिहार में महागठबंधन की सरकार बनाने के बाद नीतीश कुमार 5 सितंबर से 7 सितंबर के बीच गैर भाजपा दलों के 10 मुख्य विपक्षी नेताओं से मुलाकात की थी। उन्होंने कांग्रेस की सोनिया गांधी और राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी। इसके अलावा उन्होंने जेडीएस नेताा एचडी कुमारस्वामी, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, माले महासचिव दीपांककर भट्टाचार्य, सीपीआई के महासचिव डी राजा,एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, इनेलो प्रमुख ओम प्रकाश और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल से भी मुलाकात की थी।
नीतीश कामयाब रहे तो 273 सीटों पर होगा सीधा मुकाबला
जेडीएस - कर्नाटक -28 सीट
वाईएसआर कांग्रेस- आंध्रप्रदेश-25 सीट
बीजेडी- उड़ीसा - 21 सीट
आप- दिल्ली, पंजाब - 20 सीट
टीआरएस- तेलंगाना - 17 सीट
इनेलो - हरियाणा- 10 सीट
लेफ्ट - केरल, पश्चिम बंगाल- 62 सीट
एनसीपी, शिवसेना- महाराष्ट्र- 48 सीट
टीएमसी- पश्चिम बंगाल- 42 सीट





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