अनाथ हो गया आम आदमी
लगभग पांच दशक तक लगातार टाईम्स  ऑफ इंडिया के पहले पेज पर  धारीदार जैकेट,धोती और गोल चश्मा पहने जिस आम आदमी का इंतजार समूचा देश  हर सुबह किया करता था, वह आज अनाथ हो  गया। आम आदमी के इस किरदार को अमर बनाने वाले मशहुर व्यंग्य चित्रकार  रासीपुरम कृष्णास्वामी लक्ष्मण यानि आर के लक्ष्मण 94 वर्ष की आयु में आज हमेशा के लिए अपने आम आदमी और उसे चाहने वाले को अलविदा कह गये। आर.के.लक्षमण अपने इस आम आदमी के माध्यम से समाज में फैली कुरितियों,  लोगों के रोजमर्रा की मुश्किल भरी जिन्दगी, राजनीतिक विदूषकों और उनकी विचारधारा तथा सामाजिक मसलों पर उनकी मासूम सी टिप्पणियों ने लोकतंत्र में उसकी ताकत का अहसास कराया। आर के लक्षमण का यह आम आदमी सत्ता से दूरी बनाकर भी  ऩेताओं पर बिना किसी दुर्भावना के निशाना साधने वाला एक ऐसा ख़ामोश आवाज़ बना जो बिना कुछ कहे नेताओं को उनके दायरे और वायदों का अहसास करा देता था।
      आर के लक्ष्मण का जन्म 1921 ई. को मैसूर के एक साधारण शिक्षक परिवार में हुआ था। वे 6 भाईयों में सबसे छोटे थे। लक्ष्मण को चित्रकारी से प्यार अपनी बाल्यावस्था में ही हो गया था। वो तीन वर्ष की आयु से ही घर की फर्श, दीवारों और दरवाजों पर चित्र बनाया करते थे, जिसके लिए उन्हें अक्सर अपने परिजनों से डांट सुनना पड़ता था। चित्रकारी के प्रति उनका ये प्यार जुनून में उस समय परिणत हो गया जब उनके एक शिक्षक ऩे उनके द्वारा बनाये गए पीपल के एक पत्ते की जमकर तारीफ की थी, जिसके बाद वो  चित्रकार बनने की ठान लिए।
        फर्श से अर्श तक की दूरी को तय करने का उनका यह सफर इतना आसान नहीं रहा । उन्हें सबसे पहला झटका उस समय लगा जब हृदयाघात ने इनके पिता को  किशोरावस्था की आयु में ही इनसे दूर कर दिया। लेकिन ये कहाँ हिम्मत हारने वाले थे इन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। लक्ष्मण को दूसरी बार उस समय निराशा हाथ लगी जब मुम्बई के जे.जे कॉलेज  ने उनके नामांकन के आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था  कि  उनके चित्रों में इस कॉलेज के लायक काबिलियत नहीं है। इसके बाद इन्होंने मैसूर के महाराजा कॉलेज में दाखिला लिया।
          लक्ष्मण अपने कार्यों की शुरुआत अपने छात्र जीवन से ही कर दिये थे। जब वे कॉलेज में अपनी पढ़ाई कर रहे थे उसी समय से उन्होंने अपने बड़े भाई आर के नारायण के कहानियों का चित्रण द हिन्दु पत्रिका में किया करते थे। साथ ही  मैसूर की स्थानीय पत्रिका स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक कार्टून भी बनाया करते थे।
     लक्ष्मण ने अपने पूर्णकालिक कार्टूनिस्ट जीवन की शुरुआत द फ्री प्रेस जर्नल से एक राजनीतिक कार्टूनिस्ट के रुप में की थी। 1951 में ये टाईम्स ऑफ इंडिया से जुड़े और बहीं उनके पेंसिल ने आम आदमी को उकेरा । उन्होंने लगभग पांच दशक से ज्यादा वहाँ कार्य किये।
       पूरी जिन्दगी समाज के वंचित तबकों के हक और तकलीफों को उठाने वाले, सत्ता पर तंज कसने वाले लक्ष्मण ने  न ही कभी  किसी सियासतदां से मुलाकात की और न ही कभी राजनीति से निकटता रखी। समाज में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें मैग्सेसे,पद्मभूषण, और पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया है। मायरूपी इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़कर उनके चले जाने से चेहरे पर मुस्कन लाने और कुछ कड़वे यथार्थ से दो चार कराने वाले कार्टूनों की दुनिया का एक कोना खाली हो गया।


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