बैक वाली लड़की

तब मैं दिल्ली में एग्जाम दे रहा था। एचआर का फोन आया शंभू जी आपके डॉक्युमेंट्स आपको मिल गए। नहीं सर। क्यों? सर अभी मैं एग्जाम देने दिल्ली आया हुआ हूं। ओके । सुनिए बोकारो पहुंचते ही बैंक वाला फॉर्म किसी आईडीबीआई शाखा में सब्मिट कर दीजिएगा। बेहतर होता कि आप इसे धनबाद के ही किसी ब्रांच में सब्मिट कराते। ओके सर। बोकारो आते ही मैंने नजदीकी आईडीबीआई बैंक शाखा का पता लगाया। शाम के लगभग चार बज रहे होंगे। रिपोर्टिंग का असाइनमेंट पूरा कर मैं बैंक पहुंचा।
 गेट ओपन करते ही सामने वाले काउंटर पर ‘मे आई हेल्प यू’ का बोर्ड टंगा मिला। पीले रंग के टेबुल के पीछे हरे रंग की मूवेबल चेयर पर एक सांवली सी लड़की बैठी थी। उम्र यही कोई 23-24 वर्ष रही होगी।

हैलो मैम।
जी कहिए,  नजरें उपर करते हुए खनकदार बिहारी टोन में वह बोली...
मैम मुझे ये ऑफिस से मिला है। मद्धिम आवाज में मैंने बताया..

 अच्छा तो आप सैलरी अकाउंट ओपन करवाना चाह रहे हैं.. फॉर्म पर नजरें दौड़ाते हुए वह बोली...2रू. वाला एक पेन उसके होंठ के पास था...
 बिहारी टोन के साथ हिंग्लिश काफी दिनों बाद सुना था। वो भी झारखंड में...
जी मैम.कॉन्फिडेंस के साथ मैंने कहा...
यहां का अड्रेस प्रूफ आईडी प्रुफ है? और हां पेन कार्ड तो होगा ही आपके पास... फॉर्म को डेस्क पर रखते हुए वह पूछी...

मैम है तो सबकुछ लेकिन यहां का कुछ भी नहीं है। सिवाय ऑफिस वाले इस डाक्युमेंट के...

मेरे चेहरे को निहारते हुए वह तेज कदमों से बैंक के पीछे वाले हिस्से में गई।

अंदर से मुस्कुराते हुए आई और बोली सुनिए फॉर्म भर दीजिए...

मैम मुझे पूरा भरना होगा। आश्चर्य वाले भाव में मैंने पूछा

क्यों नहीं भर सकते? चेहरे पर प्रश्नवाचक भाव बनाते हुए वह मुझसे पूछी

 मैम इतना सारा..

अच्छा सुनिए आप यहां, यहां और यहां साइन कर दीजिए बाकी सब मैं भर देती हूं। जवाबदेही के साथ वह बोली.. मेरे साइन करने के बाद वह फार्म भरने में जुट गई...

उसके फॉर्म भरने के रफ्तार को देखकर मैं हैरान था। प्लिज फिल इन कैपिटल लेटर लिखे सैंकडों आयताकार खांचे वाले फार्म को इस कदर वह भर रही थी जैसे खाली सड़क देखकर बाइक की रफ्तार खुद ब खुद तेज हो गई हो... मैं बस उसके उंगलियों को देखते जा रहा था....

वह समझ गई। मुस्कुराते हुए बोली अब आदत सी हो गई है... आपलोग खबर लिखते हो मैं फॉर्म भरती हूं...

साइन कर के मैं चला गया वह मुझे एक सप्ताह बाद पासबुक के लिए बुलाई।

एक सप्ताह बाद वही लड़की मुझे कैश काउंटर पर लगे पारदर्शी शीशे के पीछे नोट गिनते हुए दिखी।

मैं सीधा उसके पास पहुंचा। आप क्या-क्या करती हो? बिना कुछ सोचे-समझे सवाल दाग दिया...

आत्मविश्वास से लबरेज वह बोली जो बॉस बोल देते हैं...

आगे बिना कुछ बोले अपने आगे लगे डेल के कंप्युटर चेक करते हुए वह बोली अरे आपका अकाउंट तो अभी तक खुला ही नहीं है। शायद कुछ दिन और लगेगा...इतना कह कर वह फुल स्पीड से नोट गिनने लगी।

 खैर कुछ दिन बाद मेरा अकाउंट खुल गया। पैसा निकालने गया वह मुझे कैश काउंटर के पीछे ही मिली। इस बार देखते ही बोली खुल गया न आपका अकाउंट। 

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