ईमी डायरी-5 ...क्योंकि वह दिल्ली की लड़की थी

अब मेरे सामने दूसरा कोई रास्ता नहीं था शिवाय किसी का नाम बताने के. पांडे, शिवम और साथ बैठी सभी लड़कियां अपना हर अस्त्र का इस्तेमाल कर चुकी थी. अगर नहीं बताया तो हमारी मित्रता खत्म जैसी धमकियां मिलने लगी थी. अब अगर मित्रता और उन लोगों के इस जाल से निकलना है तो किसी न किसी लड़की का नाम बताना ही होगा मन ही मन मैंने सोचा. लेकिन एक सच्चाई यह भी थी कि जब मेरे दिल में किसी लड़की के प्रति ऐसा ख़याल था ही नहीं तो मैं किसका नाम बताउं. मेरे लिए यह सबसे बड़ा सवाल था. एक तरफ कुआं तो दूसरी ओर खाई वाली स्थिति थी. पापाजी मुझे पढ़ने के लिए दिल्ली भेजे थे. भैया जी एक काबिल इंसान बनाने के लिए यहां बुलाए थे. और मैं एक पत्रकार बनने के लिए यहां आया था. उस समय तक मेरे दिमाग में कुछ चलता था तो बस यही. घर से जब निकल रहा था तो पापा ने सैकड़ों हिदायतें और सलाह दिए थे और मैं एक आदर्श बेटे की तरह उनकी हिदायतों का पालन कर रहा था. कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा.  वो भी इतनी जल्दी..
मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि मैं किसका नाम बताउं.  उनलोगों कि निगाहें मुझे ऐसे घूर रही थी जैसे गिद्ध अपने शिकार पर नजरें गड़ाए हो. खैर काफी सोच विचार कर मैंने एक लड़की का नाम बताने का फैसला लिया. दरअसल वह क्लास की सबसे नई लड़की थी.  क्लास स्टार्ट होने के 15-20 दिन बाद उसने आना प्रारंभ किया था. हमारी बातचीत पहले दिन से ही शुरू हो गई थी.  दिल्ली की यह पहली लड़की थी जिसने मुझे फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा था. उसकी बातचीत,  उसका व्यवहार, उसकी हैंडराइटिंग से मैं काफी प्रभावित था. तो मैंने निश्चय किया कि मैं इसी का नाम बता कर इन लोगों से अपना पिंड छुड़ा लुंगा..
लेकिन हिम्मत कहां से लाता. उस वक्त मेरे पास इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं दो लड़के और तीन लड़कियों के सामने यह बता पाउं कि मुझे फ्लां लड़की क्लास में सबसे अच्छी लगती है. तब मैंने पांडे से कहा कि मैं तुम्हें अकेले में बताउंगा.  इतना कहते ही पांडे मुझे कैफेटेरिया में ले आया. वहां उसे इस शर्त पर कि वह किसी को नहीं बताएगा कान में चुपके से उस लड़की के नाम का पहला अक्षर 'एस' बताया. लेकिन वह दोस्त की तरह कमीना निकला.उसने ईशारे से समझ लिया कि मैं श्वेता की बात कर हूं और तुरंत अंदर आकर सभी को यह बता दिया. अब मेरे पास इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उन लोगों को फेस कर पाउं. मैंने अपना बैग लिया और रूम आ गया.
अगले दिन क्लास आया तो मुझे अपना क्लास बदला-बदला सा लगा. इन करते ही हर कोई मुझे एक अजीब सी निगाह से देख रहे थे. जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो. मैं थोड़ा घबरा गया. तब अमित ने बताया शंभू तुमने श्नेता के बारे में ऐसा क्या बोला है कि वह रो रही है. मैंने उसे समझाया अरे यार ऐसी कोई बात नहीं है.
मैं उसी समय श्वेता के पास गया और उसे बताना चाहा कि श्वेता ऐसी कोई बात नहीं है जिससे तुम्हें परेशान होना पड़े.  लेकिन उस पल वह मुझसे बात नहीं की.  मुझे अफसोस हुआ कि मेरी वजह से किसी लड़की को ठेस पहुंचा. क्लास में पूरे दिन यह चर्चा का विषय रहा.  किसी ने मुझे श्वेता के काबिल बताया तो किसी ने कहां श्वेता और कहां शंभू जैसी बातें की.  लेकिन मुझे दु:ख, अफसोस और पांडे पर गुस्सा आ रहा था.  यह इतना बड़ा मुद्दा बन जाएगा मैंने कल्पना भी नहीं किया था. मैं क्लास के अंत में भी श्वेता को बताना चाहा कि जैसा लोग बोल रहे हैं ऐसा कुछ भी नहीं है. मैं यहां केवल पढ़ने आया हूं लेकिन वह मेरी एक न सुनी.
मैं काफी व्यथित होकर घर लौट ही रहा था कि रास्ते में विपुल का फोन आया. उसने मुझे धमकी भरे लहजे में कहा तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हुई श्वेता के बारे में ऐसा कहने की.  मैंने सोचा चलो इसे ही समझा देता हूं सारी बात. शायद ये उसे समझा दे. लेकिन उसे तो श्वेता की नजर में हीरो बनना था. वह अपनी ही धुन में था. उसने भी मेरी एक ना सुनी. मुझे गुस्सा आया और मैंने फोन काट दिया. खैर कुछ दिन बाद मामला शांत हुआ.मुझे लोगों से मुफ्त में कई सलाह मिले.  तीन साल तक इस कहानी में कई मोड़ आए जिसका जिक्र फिर कभी. लेकिन इस घटना ने मुझे कई लोगों के अलग-अलग रूपों से रू-ब-रू कराया.

यह हंगामा केवल इसलिए बरपा था क्योंकि वह दिल्ली की लड़की थी. वह आज मेरी एक अच्छी मित्र है. लेकिन सो कॉल्ड गर्लफ्रेंड बनाना न ही मैंने आज तक सीखा है और न ही बनाया है.  इसे आप ये भी समझ सकते हैं कि मुझे बनाना नहीं आता ये आप पर निर्भर करता है कि आप इसे किस तरह देखते हैं. लेकिन मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि ये मेरी जिंदगी है और इसे मैं अपनी तरीके से जीना चाहता हूं... 

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