मैंने 19K को 52K में तब्दील होते देखा
तब मैं शायद दूसरी कक्षा में पढ़ता था। क्रिकेट आते ही दादाजी की रेडियो जिसके एक कोने में संतोष लिखा होता था, चिल्लाना शुरू कर देता था। हालांकि वो हर शाम साढ़े सात बजे से साढ़े दस तक आकाशवाणी और बीबीसी लंदन से कुछ सुनाया करता था। शायद समाचार। क्रिकेट वाले दिन वह दोपहर के दो बजे से ही ऑन हो जाता था। भारत बनाम एक्सस, वाई, जेड मैच शुरू होते ही आसपास के आठ-दस लोग दादाजी के कमरे में पहुंच जाते थे। चाची जी की ड्युटी होती थी हर 20 मिनट पर इनकी खातिरदारी में चाय पहुंचाए। हम भाइयों को मजबूरन उस रेडियो के आगे बैठना होता था(क्योंकि दादाजी कभी भी किसी को आवाज लगा सकते हैं)। हालांकि भैया जी इसमें दिलचस्पी भी लेते थे। उस दिन हमारा खेलना बंद। लाइट आते ही रेडियो बंद। और ब्लैक इन व्हाइट टीवी ऑन। लोगों की निगाहें एक टक टीवी स्क्रीन पर टिक जाती थी। सभी सचिन के बड़े वाले भक्त में शुमार थे। सचिन के आउट होते ही मातम ऐसा छाता जैसे इनका अपना कोई इनसे बिछड़ गया हो।
क्रिकेट में थोड़ी-बहुत दिलचस्पी यहीं से आई थी। इतना भी नहीं कि अपर कट, मिड विकेट और प्वाइंट जैसी बारीकियों को जानूं। हां छक्का, चौका और थर्ड मैन की समझ थी। थोड़ी बहुत बाइड और नो बॉल की भी। महेंद्र सिंह धोनी नाम के शख्स की इंट्री ने मुझे भी क्रिकेट में रमा दिया। इसके सेंचुरी मारते ही दिल गदगद और आउट होते ही मैच देखना बंद। कारण नहीं पता। क्योंकि एक नहीं कई कारण हैं। डिटेल फिर कभी। अभी भी पूरा तो नहीं लेकिन हां क्रिकेट के बारे में लिख लेता हूं (खास कर लाइव इंडिया में क्रिकेट पर खूब लिखने का मौक मिला था।) ।
आज ऑफिस में फेसबुक ओपन किया तो न्यूज फीड के सबसे उपर लाइव क्रिकेट देखिए मिला। नीचे जाने पर लगातार सभी यही शेयर किए दिखे । एक पर क्लिक मैंने भी कर दिया और आराम से बिना किसी शोर-शराबे के जाधव की बेहतरीन पारी का लुत्फ उठाया। हालांकि पांड्या और जडेजा से उम्मीद भी किया पर निराशा ही हाथ लगी। पर इस दौरान सबसे दिलचस्प रहा स्क्रीन के उपर लाल रंग के आंख वाली निशान में एक नंबर का अप्स एंड डाउन होना। 19 हजार था वह जब मैंने मैच देखना शुरू किया था। बंद किया तो यह 52 हजार था।
बचपन में कहीं पढ़ा था, अब हर दिन सुनता हूं कि परिवर्तन ही संसार का नियम है। समय के साथ बदलिए नहीं तो जमाने की दौड़ में पीछे छूट जाइएगा।



बदलाव को बखूबी लेखनी से उकेर दिया, बढ़िया
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