लालिमा

साल 2001, महीना हिन्दी में माघ और अंग्रेजी में फरवरी का था। उस साल की सर्दी अपने आखिरी दिन गिन रही थी। शाम के लगभग सात बज रहे होंगे। दालान(घर के बाहर का एक कमरा) के बाहर दादाजी का बैठका लगा था। अंदर हम भाई-बहन पढ़ाई कम दिनभर की कानाफूसी में मश्गूल थे। इतने में एक मद्धिम आवाज में भर्र-भर्र करती हुई स्कूटर हमारे दरवाजे पर रुकी।

हम भाई-बहन दौड़ते हुए कमरे से बाहर आए। पापा पीछे से उतर रहे थे। मनोज दा(अब स्वर्गीय हो गए) इसे एसएम ऑटोमोबाइल, शेखपुरा से ड्राइव कर लाए थे। चटकदार नीले रंग के एलएमएल की व्हेस्पा को देखकर घर में खुशी की लहर दौड़ गई थी। दादाजी, हम बच्चे कभी उसके आगे जा कर तो कभी पीछे से उसे देख रहे थे। तब मनोज दा ने बताया था कि ये फिलहाल व्हेस्पा की टॉप मॉडल है। उस समय इसकी कीमत 35 हजार रुपए थी। पापा इससे पहले कभी कोई बाइक नहीं चलाए थे। साइकिल थी उसे चलाकर ही खुश रहते थे। दादाजी एक दिन अचानक बात-बात में बोल दिए थे साला मेरा बेटा होकर कब तक साइकिल से चलेगा, जाओ पसंद की बाइक खरीद लो।


रामकिशोर चा (हमारे पड़ोसी) पापाजी को कॉलेज ग्राउंड में ले जाकर कुछ बेसिक चीजें बताकर हाथ में हैंडिल दे दिए। पापा शुरू में थोड़ा घबराए। एक बार गिरे भी।लेकिन फिर जो संभाले आज तलक दोनों का साथ नहीं छूटा। शुरुआत के दस वर्ष तो पापा ने इसे इतना सहेज कर रखा कि किसी को इसमें टच करने तक की भी इजाजत नहीं थी। गलती से कोई चला भी लेते थे तो वे इसे अपनी खुशकिस्मती समझते थे।
अब हम भाइयों की बारी थी। Amarभैया जी कुछ -कुछ बाइक चलाना दिल्ली में सीख लिए थे। आए तो पापा ने खुद स्कूटर की चाबी उन्हें थमा दिए। उसके बाद Samar भैया। सबसे आखिर में मैंने भी बाइक चलाने की शुरूआत अपनी इसी खानदानी स्कूटर से किया।

सर्विसिंग के बाद अब तक बस एक बार इसकी रिपेयरिंग हुई है। तब से लेकर अभी तक लालिमा एक किक में स्टार्ट होते आ रही है। दादा जी के साथ-साथ उनके परपोते तक इसकी सवारी कर चुके हैं। अब बस प्रयास यह कि पापा जब तक चला सकें उनकी इस लालिमा का साथ न छूटे।
नोट:-पापा अपने पसंदीदा वस्तु को लालिमा के नाम से पुकारते हैं।

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