दिन रविवार। दोपहर के 12 बज रहे थे। दफ्तर की मीटिंग के बाद चाय की तलब
में नया मोड़ की ओर निकला था। अभी पहला ही मोड़ पहुंचा था कि आंखों को एक न
यकीन होने वाला दृश्य दिखा। तकरीबन 17 महीने बीता चुका हूं बोकारो में। यह
नजारा बिलकुल नया था। सामान्य सी दिखने वाली सैकड़ों महिलाएं बिलकुल
कतारबद्ध होकर चली जा रहीं थी।बदन पर सामान्य सी साड़ी, सलवार, हवाई चप्पल,
बालों में भरपूर मात्रा में तेल, हो
ठों पे कोई लिप्सटिक नहीं। इस सड़क पर इस प्रकार की इतनी महिलाओं का दिखना मुझे हैरान कर गया।
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| कार्यक्रम के दौरान उपस्थित महिलाएं |
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बाइक की रफ्तार धीमी कर जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, इनकी संख्या उतनी ही
तेजी से बढ़ रही थी। ट्रैफिक नियमों का बिना उल्लंघन किए ये आपस में गप्पे
मारते चले जा रहीं थीं। अब तक मैं लगभग 500 मीटर की दूरी तय कर चुका था।अब
मुझसे रहा नहीं गया। एक बैच लगाए सज्जन से पूछा ये महिलाएं कौन हैं और कहां
जा रहीं हैं? उन्होंने मुझे घूरा। मैंने तुरंत अपना परिचय दिया। बाइक की
हैंडिल पकड़ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। ये वनवासी महिलाएं हैं। बोकारो
के अलग-अलग प्रखंडों से (गोमिया, ललपनिया, कसमार, जरीडीह) चलकर यहां हमारे
नेता को सुनने जा रहीं हैं। मैंने कहा वनवासी!उन्होंने कहा हां.. आप
इन्हें आदिवासी भी कह सकते हैं।
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| कार्यक्रम में लोक कला की प्रस्तुति देते वनवासी कलाकार |
मैं भी उनके साथ हो लिया और पहुंच
गया मजदूर मैदान। यहां पहले से ही सैकड़ों की संख्या में लोग थे। एक
टेंटनुमा स्टेज था। उस पर पांच सात लोग एक मामूली से माइक पर बोल रहे थे।
दो चार छोटे-छोटे साउंड बॉक्स से उनकी आवाज भीड़ तक पहुंचं रही थी। मैं अभी
कुछ समझ ही पाता कि मित्र सीपी सिंह का फोन आ गया। वो मुझे वहीं बुलाना
चाहता था। इस कार्यक्रम का सह मीडिया प्रभारी था। उसने मुझे विस्तार से
वनवासी क्लयाण केंद्र के इस कार्यक्रम की जानकारी दी।
इतनी अनुशासित
भीड़। इतनी सादगी से इतनी संख्या में लोगों तक अपनी बातों को साफगोई से
पहुंचाने की घटना (हां घटना मैं जानबूझ कर लिख रहा हूं) बोकारो में मैं
पहली बार अपनी नग्न आंखों से घटित होता देख रहा था। वर्ना इस शहर में किसी
भी कार्यक्रम से पहले चमचे अपने हुक्मरानों के स्वागत में पूरे शहर को
होर्डिंग, बैनर और पोस्टर से पाट देते हैं। साउंड सिस्टम तो इतने कानफोड़ू
होते हैं कि इनका वश चले तो ये दूसरे शहर तक अपनी बात पहुंचा दें।
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