रात दो बजे के बाद भी वो आखिरी पन्ना नहीं भेज पाने का अफसोस
रात के दो बज रहे थे। सिटी सेन्टर के साथ ही उसके
सबसे आखिरी कोने मे स्थित मेरा दफ्तर भी बिलकुल वीरान हो चुका था। सारे लोग अपने-अपने
घर जा चुके थे। ऑफिस का पीएनटी नंबर, मेरा मोबाइल और ओमकार भैया (चीफ विजुअलाइजर) के
मोबाइल लगातार बज रहे थे। पिछले 30 मिनट से हमदोनों के एक में हाथ मोबाइल और दूसरा
हाथ की-बोर्ड पर चल रहा था। 150 किलोमीटर दूर हमारे बॉस दस मिनट में आठ बार
मुझे कॉल कर चुके थे। एकदम सामान्य समझाने से शुरू हुई हमारी बातचीत उनके गुस्से तक
पहुंच गई थी। हम परेशान थे। बॉस को मुझसे भी ज्यादा फोन आ रहे थे। हमारे सिस्टम को
धनबाद से लेकर जयपुर तक के लोग रिमोट पर ले चुके थे। लेकिन शनिवार एडिशन का वह छह
नंबर पेज जिसके मास्ट हेड पर लिखा था बेरमो आसपास। हम नहीं छोड़ पाए। हम लाचार थे।
मैं और ओम भैया आखिर तक मेहनत करते रहे।
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| डेस्क के दौरान किए गए काम-1 |
शंभु इस मुश्किल घड़ी में की गई हमारी मेहनत को हम बेकार नहीं जाने देंगे।ओम भैया ने कहा। एक बार और ट्राई करो। यह तीसरी मर्तबा था जब मैं उस पेज का करेक्शन
कर रहा था। इस बार थोड़ा गंदा भी किया था। लेकिन सर्वर की हमसे नाराजगी ऐसी कि उसके
रीस्टार्ट होने का औसत दर मिनट दर मिनट कम होता गया। धनबाद से संजय पांडे (डमी इंचार्ज)लबोल दिए कि बॉस का ऑर्डर मिल गया है। धनबाद का पन्ना चला रहे हैं उसकी जगह। आप क्या कहते हैं शंभु
जी? छोड़ दिजीए सर। बॉस भी आखिर में यही बोले थे कि जब लोगों के हाथ में अखबार
पहुंचेगा ही नहीं था तुम्हारी मेहनत का क्या? और सुबह बेरमो आसपास की जगह उस पेज के मास्ट हेड में झरिया-धनबाद लिखा हमारे सामने आया।
उस रोज मैं पूरी रात सो नहीं पाया। ओमकार भैया दफ्तर
से निकलते वक्त बोले रहे थे कि शंभू तुझमें गजब का धैर्य है। या तुम बच्चे हो। कहां
से लाते हो इतनी शांति अपने अंदर। लगभग 20 दिन से मैं डेस्क हेड के रूप में काम कर
रहा था। इतनी बुरी तरह कभी नहीं फंसा था। मशीन किस तरह धोखा देती है इसे पहली बार महसूस किया था। इस दौरान कभी बॉस को इस बात के लिए फोन करने की जरूरत नहीं पड़ी थी
कि क्या बोकारो आज नहीं छपेगा। हां 10-12 मिनट जरूर लेट हो जाते थे अपने तय समय से।
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| काम-2 |
डेस्क की दुनियां थोड़ा गम कहीं ज्यादा खुशी देती
है
थोड़ा टफ जरूर है लेकिन एक अलग मजा है डेस्क के
काम का। 10 अलग-अलग मिजाज के पन्नों को एक तय समय पर छोड़ने की जिम्मेदारी। उसकी जवाबदेही। सुबह
जग कर अपनी एक रिपोर्ट को तलाशने के बजाए पूरे अखबार को आराम से पढ़ना। कुछ गलती मिलने
के बाद अफसोस और अच्छा रहने पर खुशी। बिलकुल सुकुन सा देता है।
20 दिनों में ही अपने संस्थान के उन अनजान लोगों
से जिनसे मैं आज तक नहीं मिला हूं। फोन के बात से ही एक आत्मीय रिश्ते का बन जाना सच में दिल को तसल्ली
देती है। संजय पांडेय सर, फोन करते ही, हां भाई साहब… कैसे हैं… डमी भेज दूंगा… बस आप समय से भर कर दीजिएगा… इतनी ही तो बातें होती थी हर दिन। शनिवार को उन्हें
भी पता चल गया कि शंभू को डांट पड़ी है। वे दो बजे रात में भी समझाए और रविवार दोपहर
को भी आधे घंटे से ज्यादा समय तक समझाया। धीरेंद्र जी (फोटो स्कैनिंग)। धनबाद वाले।
फोन करते ही, हौशला बढ़ा देते। सर फोटो की चिंता मत कीजिएगा… फंसने तुरंत मुझे भेज दीजीएगा। गुंजन सर (आईटी),
शंभू टेंशन लेने का नहीं... बस मजे से काम करने का। रांची वाले नईम जी(स्कैनिंग) क्या
जनाब आज जान लेकर ही छोड़िएगा... बेरमो के सुभाष जी से खबरें मंगाना और उनका तकियाकलाम।
हां साहब.. और हमारे डेस्क की टीम की मस्ती। इन्हीं बातों और मस्ती में हम अपने काम
को अंजाम तक पहुंचा देते थे। और सुबह ठीक-ठाक अखबार लोगों तक परोस देते थे।
धर्मेंद्र झा सर (बॉस), शुक्रिया। इस आजादी के लिए। इस
अपॉर्चुनिटी के लिए। इस सपोर्ट के लिए। इस विश्वास के लिए। उस डांट के लिए भी जो मेरी
गलती पर आप मुझे सुनाते हैं। हालांकि डेढ़ साल में दो ही बार तो आप मुझे डांटे हैं।
और वो भी सबसे बड़ी-बड़ी गलती पर। शुक्रिया बॉस।


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