जैक की मशीन पर कपड़ों के संग सपने बुनती महिलाएं...

पति भी हैं। अभी घर पर बैठे रहते हैं। पहले कमाते थे। फिलहाल कुछ काम नहीं है। अपने खर्चे से ही घर चला रही हूं। दो बच्चे है।बेटा संत जेवियर्स (शहर का एक प्रतिष्ठित कॉलेज) में पढ़ रहा है। बेटी को उर्सुलाईन हाई स्कूल में पढ़ा रही हूं। पहले मिड डे मिल में काम करती थी। कुछ महीने से ये काम कर रही हूं।  जैक की सफेद और हाई टेक सिलाई मशीन पर उंगलियां फेरते 50 वर्षीय सुनीता तिर्की एक सांस में इतना कुछ कह जाती हैं। सुनीता सखी मंडल की उस मंडली का हिस्सा हैं जो गांव की दहलीज को लांघ  कामयाबी की एक नई इबारत लिख रही हैं।

इसी मंडली की सदस्या हैं बैजयंती कुमारी। कहती हैं कि बच्चों को शिक्षक बनाना है। लेकिन यह केवल पति के पैसे से कहां संभव था। उनके पैसे से तो घर का ही खर्च सही से चल जाए यही बहुत है। अब मैं भी उन्हें सहयोग कर देती हूं।


प्रशिक्षण सह प्रोडक्शन केंद्र में काम करतीं महिलाएं।

ओटीसी ग्राउंड स्थित पंचायती राज भवन के दूसरे माले स्थित पीली दीवार और सफेद रंग की सीलिंग के नीचे सुनीता और बैजयंती  की तरह तकरीबन पचासों महिलाएं अपने काम में तल्लीन थी। कोई कपड़े में बटन के लिए छेद कर रहीं थी तो कोई उस छेद में बटन लगा रहीं थी, किन्हीं का काम स्टीच करने का था तो किन्हीं का ओवरलॉकिंग, कोई पैंट में पॉकेट बना रहीं थी तो कोई शर्ट का कॉलर सिल रहीं थी।
ये महिलाएं उस अंग्रेजी मशीन की मोटी सुई से केवल कपड़ों को एक आकार नहीं दे रहीं थी। इनके साथ ये अपना भविष्य भी बुन रहीं थी। जिसमें सपने थे सुनहरे कल की, बच्चों के बेहतर करियर की, बेटी को अच्छे घर ब्याहने की। अच्छे जीवन-यापन की। बैजयंती कहती हैं कि मशीन तक इनके पांव को पहुंचने के लिए हर रोज पगडंडियों की कोसो यात्रा पैदल तय करनी होती हैं।




झारखंड राज्य आजीविका मिशन की शांति मार्डी  बताती हैं कि जब सरकार ने यह फैसला लिया था कि स्कूल बच्चों का पोषाक ये महिलाएं बनाएंगी तो वह डर गईं थी। गांव की महिलाएं क्या मामूली से प्रशिक्षण में वह परफेक्शन दे पाएंगी जो कंपनी के कारीगर देते हैं। अभी तक जूट का बैग और मैसेज वाला बोरा सिलने वाली ये महिलाएं हजारों की संख्या में स्कूल ड्रेस बना पाएंगी। मार्डी कहती हैं कि अब इन्हीं महिलाओं पर उन्हें गर्व हो रहा है। उन्हें अब इस बात का अफसोस भी है कि वह खाली साढ़े तीन हजार बच्चों काऑर्डर ही क्यों ली, सभी बच्चों का ले लेती। परफेक्शन ऐसा कि मार्डी पैकिंग का कपड़ा खोल कर फक्र से मंडली की महिलाओ ंके काम को दिखाती हैं।


सखी मंडल की महिलाओं के द्वारा तैयार स्कूली बच्चों का ड्रेस 

रांची के उपायुक्त की ट्वीट के बाद मैं एक योजना की तहकीकात करने पहुंचा था। वहां से लौटते वक्त मेरे पास खबर के साथ उन महिलाओं के चेहरे की मुस्कान थी जिनकी खुशियां चौखट के अंदर समेट दी गई थी।

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