राष्ट्रवादी पार्टी में लाल बिंदी वाली वो नेत्री...
सुषमा जी नहीं रहीं। यह यकीन कर पाना
उतना ही कठिन है जितना दो विधान दो निशान जी रहे लोगों को यह स्वीकार कर पाना कि
अनुच्छेद 370 अब इतिहास हो गया है। चौड़े पाड़े वाली साड़ी, माथे पर सिन्दूर और ललाट
पर बड़ी सी लाल बिंदी वाली वह नेत्री नहीं दिखेंगी। देश के सबसे बड़े पंचायत में गूंजने
वाला वह कर्णप्रिय आवाज हमेशा के लिए शांत हो गया। कितना मुश्किल है न इसे यकीन कर
पाना।
मैम जब आप आखिरी बार यूएन में संबोधित
कर रही थी तब लग रहा था कि हमारे गांव के बीच की ही कोई चाची, काकी, ताई दीदी डायस
से पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दे रहीं हों। आपने यूनाइटेड नेशंस को भी उसी
शालीनता से फटकार लगाई थी। दुनिया के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म पर भी आपने अपना वही
लिबास धारण किया था जो आप देश के सबसे छोटी जगह की रैली में पहनती हैं।
एक बार मेरी एक दोस्त से इस बात पर
बहस हो गई थी कि बिंदी तो फेमनिज्म की निशनी है। अक्सरहां उन्हीं शहरी महिलाओं को
बड़ी बिंदी में देखा जाता है जो फेमनिज्म को बढ़ावा देती है। तब हम जरूर देहात से
निकल शहर पहुंचे थे, लेकिन तब भी उस जाहिल को मैंने इतना ही कहा था कि बिंदी तो लड़कियों
का श्रृंगार है। उसकी काहे की विचारधारा।
काहे का लेफ्ट और काहे का राइट। अब यह भी सच्चाई है मैम कि इस राष्ट्रवादी पार्टी के
किसी कतार में अब कोई महिला नेत्री नहीं दिखेंगी जिनके ललाट पर लाल सी बड़ी बिंदी चमकती
हो।
मैम हमारी पीढ़ी के युवाओं ने इंदिरा
गांधी के काल को नहीं देखा है। इतिहास के पन्नों पर किन्हीं ने उन्हें दुर्गा कहा
है तो किन्हीं ने लिखा है कि इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा। हम जब राजनीति
का ककहरा पढ़ रहे थे संसद में आपको ही अपनी वाक्पटुता से विरोधियों के छक्के छुडाते
देखा है। यूपीए के दूसरे शासनकाल में लोकसभा की मुख्य विपक्षी नेता के तौर पर जब-जब
आपको बोलते सुनता था मन करता था आपके
एक-एक भाषण को कहीं उतार लूं। मैम हमारी पीढ़ी के लिए लिए तो स्टेट्समैन, स्टेट्सवुमन
सब आप ही है।
नोटः इसे मैं आपके नाम खत के रूप में
लिखना चाहता था लेकिन साहस नहीं जुटा पाया कि आपको स्व. लिखूं।
आपका,
देहाती लड़का




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