बाबा

सात सौ दिनों से भी कम पुराने रिश्ते में जब कोई आपकी आवाज की मोटाई को फोन के उस पर से भी भाफ ले। आपकी आवाज का धीमापन उसे परेशान कर दे। आपके मुरझाए चेहरे की मुस्कुराहट लौटाने की खातिर वह अपना हर सुख त्यागने को तैयार रहे। दुख में कंधे से कंधा मिला कर खड़ा रहे। तब यह रिश्ता दोस्त, सहयोगी, मित्र और सहोदर की सीमा रेखा को लांघ जाता है। अंग्रेजीदां इसके लिए ब्रदर फ्रॉम अनदर मदर टाइप शब्द इस्तेमाल करते हैं। हम जैसे देहाती इस रिश्ते को प्यार से करेजा नाम देते हैं।

रिश्तों के चयन में हमेशा बेवकूफ बनने वाला, धोखा खाने वाला, नासमझ सा मैं बाबा के साथ इतनी घनिष्ठता को कभी सोचा भी नहीं था। वह 2018 के नवंबर का महीना था।चैम्बर के काले और ग्रे छींटदार सोफे पर जब हमारी पहली मुलाकात हुई थी।तब बाबा की आवाज में एक थरथराहट थी। एक रोज मेरी कांपती आवाज को इसके हौसले रूपी जैक का सहारा मिलेगा कहां पता था।


खबरों के लिए मारामारी वाली पत्रकारिता के इस दौर में
हम दोनों ने एक ही बीट को कवर किया। अलग-अलग अखबार के लिए। उस बीट के हर इंसान ने दोनों को एकदूसरे का साया कहा, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि एक ही कार्यक्रम में हम दोनों में एक गए हों। दोनों की खबर एक सी हो गयी हो। खबर की हैडिंग से लेकर बॉडी तक दोनों की अपनी होती थी। यही हमारे रिश्ते की सबसे बड़ी खासियत है। हमने कभी एक दूसरे का फायदा नहीं उठाया। दोस्ती दफ्तर की दहलीज के बाद शुरू होती है, दहलीज के अंदर आते ही हम प्रतिद्वंदी हो जाते हैं।


तीन भाई में सबसे छोटा हूँ एक 1300 किलोमीटर दूर रहते हैं एक 300 किलोमीटर । विक्रम जब से मिला है इस कमी को अहसास नहीं होने दिया है। कभी बड़े भाई सा खड़ूस, कभी छोटे सा दुलार तो कभी एक फिक्रमंद दोस्त। हर रूप में रोज़ साथ खड़ा रहता है। गुस्सा इतना खतरनाक की कई बार तो सच में इससे डर लगता है।
एक बुराई बस ये कि अपने गम को ये मुझसे भी फिल्टर कर के साझा करता है।

तुम्हें जन्मदिन पर देने के लिए मेरे पास शब्दों और यादों की यही जमापूंजी है दोस्त। जन्मदिन मुबारक दोस्त। ढेर सारा प्यार।

बाबा

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