रुचि
बात 2010 की है। दसवीं की परीक्षा पास कर लिया था। इंटर में एडमिशन लेना था। मैथ्स में अपने तीनों भाइयों में थोड़ा बेहतर था। केमिस्ट्री का सूत्र कभी पल्ले नहीं पड़ा । अंग्रेजी अभी तक सही से बुझाती नहीं। तब तो गुड्डू सर भरी क्लास में फटकार लगा दिए थे कि बाबा चार लाइन में तीन लाइन अंग्रेजिए बतियाते हैं और पोता तीन शब्द के एक वाक्य का ट्रांसलेशन नहीं कर पा रहे हो।
कुल मिलाकर हर विषय में हाथ तंग थे। पापा से ज्यादा मोहल्ले वाले का दबाव था कि फलनमां के बेटवा आर्ट्स में नाम लिखैलकैं है। आर्ट्स गांव में पांच साल पहले तक कम पढ़ने वालेे लड़कों का विषय था। तय हुआ कि भैयाजी की तरह ही साइंस पढ़ेंगे। मैथ्स की जगह बायोलॉजी रखेंगे। मेरी दिलचस्पी जरा सी भी नहीं थी।
2012 में एक बार फिर उसी मुहाने पर खड़ा था। अंतर बस इतना था कि दसवीं में अनंत(लंगोटिया यार) से प्वाइंंट पर्सेंट पीछे रहने के बाद मिली बेइज्जती को मैंने इंटर में संभाल लिया था। अब ये तय कर लिया था कि मुझे बनना क्या है। लेकिन अब पापा और भैया जी आकांक्षाएं मेरे साथ जुड़ गई थी।
पापा बी फार्मा कराना चाहते थे। इस सोच के साथ कि कम से कम दवा दुकान का लाइसेंस मिल जाएगा, तब बेटा अच्छी जिंदगी जी लेगा। डॉक्टर साहब भी पापा की इस बात से सहमत थे। भैया जी अपने भाई को इंजीनियर बनाना चाहते थे। दिल्ली के एक दर्जन कॉलेज का फॉर्म भैया जी भरे होंगे। एक बड़े संस्थान में तैयारी के लिए एडमिशन भी कराए थे। कम से कम आधा दर्जन एंट्रेस में भी शामिल हुए थे। तीन कॉलेज में एडमिशन का आमंत्रण भी आ गया था। इसमें एक बड़ी यूनिवर्सिटी भी थी।
मुझे इनमें नहीं जाना था। मैं नही गया। आखिरी में भैया जी ने मुझसे मेरी इच्छा जानी। पापा को मनाया और मेरा दाखिला मेरे पसंद के विषय में हुआ।
आज एक स्टोरी पर काम करते हुए इस बात का अहसास हुआ कि कितना जरूरी है दसवीं के बाद अपने लक्ष्य जान लेना। समाज केे दबाव की जगह अपनी रुचि अपने परिजनों को बता देना । उनसे खुल कर चर्चा कर लेना। आज मैं अपने पसंद के पेशे में हूं लेकिन दसवीं में ही पापा को इसके बारे में पूरी जानकारी दे देता तो न केवल मेरा तीन साल बेकार के विषय में बर्बाद होने से बच जाता। भैया जी का कम से कम एक लाख रुपया बच जाता।
गांव में मेरे कई जूनियर अभी भी बस इसलिए अपने पसंद के विषय में दाखिला नहीं ले पा रहे हैं क्योंकि उन्हें उनके पसंद के करियर की जानकारी देने वाला कोई नहीं है। उन्हें विषयों के चयन के बाद उसमें भविष्य की जानकारी देने वाला कोई नहीं है। उनके उपर इस बात का दबाव है कि फ्लां विषय पढ़ेंगे तो फलनामा ताना मारेगा। क्योंकि घर के अमुक रिश्तेदार हमें ये बनाना चाहते हैं।
अब हर अभिभावक को इस बात को मानना और समझना चाहिए कि हमारा बच्चा क्या बनना चाहता है। हम क्या बनना चाहते हैं। हमारी दिलचस्पी किस चीज में है।
Vikas Kumar @Dr.amit kumar सर आपका विशेष आभार रहेगा।
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