गुरविंदर कौर
अपने पापा से सीखी कई अच्छी आदतों में एक है रिश्तों का सम्मान करना। पापा के बहुत कम दोस्त हैं। जितने भी हैं उन रिश्तों को वे पूरी शिद्दत से निभाते हैं। जिंदगी की भागदौड़ में रोज हमारी मुलाकात न जाने कितने अंजान चेहरों से होती है। कुछ पल भर के मुलाकात में उम्र भर के लिए साथ हो जाते हैं। कुछ बस मुलाकात भर के लिए ही साथ होते हैं।
हमारी कामयाबी हर उस इंसान का कर्जदार है जो जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर हमारी दुरुह राह को आसान बनाने में साथ खड़े रहे हैं। हमें सहूलियत देकर आसानी से हमारी जिंदगी से निकल जाते हैं। गुरविंदर कौर। अब अपने नाम के आगे मल्होत्रा भी वो लगाने लगी हैं। मेरे जीवन की एक ऐसी ही इंसान है।
जितनी बिंदास उतनी ही बोल्ड। हमेशा चेहरे पर एक एक मीठी सी मुस्कान। जितनी खूबसूरत वह बाहर से दिखती हैं दिल की उतनी ही सुंदर। इंटरनेशनल इंस्टीट्युट ऑफ मीडिया मैनेजमेंट एंड आईटी (ईमी) में एक फरिश्ते की तरह मुझे मिली थी। उम्र में मुझसे थोड़ी बड़ी ही होगी। मैंने कभी उसे बहन कहा नहीं, लेकिन जबतक कॉलेज में साथ रही एक छोटे भाई की तरह ही मेरा ख्याल रखी।
बात 2011 की है। गांव की शांत गलियों से निकलकर मैं महानगर के भागदौड़ में शामिल हो गया था। कॉलेज में एक सप्ताह बीत गए थे। शहर वाले दोस्तों के साथ घुलने-मिलने की प्रक्रिया चल रही थी। श्वेता, गुरविंदर, स्वपनेश, छाया के साथ हमारा समूह पनप रहा था।
उस रोज क्लास खत्म होने के बाद हमलोग जीटीवी नगर मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो का इंतजार कर रहे थे। तभी किसी ने कहा चलो हमलोग किसी मॉल में घूमने चलते हैं। सभी की राय ली जा रही थी। मॉल जैसे शब्द से मेरा पहली बार वास्ता पड़ा था। बिना सोचे-समझे मैंने अपनी सहमति जरूर दे दी थी लेकिन अंदर से व्याकुल हो गया था।
उसी व्याकुलता में मैंने गुरविंदर को एकांत में लेजाकर पूछा ये मॉल क्या होता है ?
हैरानी भरी निगाहों से मुझे निहारते हुए उसने कहा, तुम मॉल नहीं जानते !
उसे कैसे बताता कि बरबीघा के इस लड़के के लिए तब शहर की सबसे बड़ी दुकान कपड़े में भीखा राम छापड़िया की और किराने में रंजन किराना ही थी।
गुरविंदर जाने से मना कर चुकी थी, लेकिन मेरी बात सुनने के बाद वह भी तुरंत चलने को राजी हो गई। हमलोग निर्माण विहार स्थित वीथ्रीएस मॉल गए। मेरे लिए सबकुछ अचंभित करने जैसा था। 19 वर्ष की उम्र में पहली बार मैं इस तरह के किसी आलीशान शॉपिंग कांप्लेक्स की आंगन में खड़ा था।
गुरविंदर मेरा हाथ पकड़ मुझे मॉल का एक-एक कोना घुमाई। मैं वहां की हर एक चीज को अबोध बालक की तरह पूछते गया। वह बिना परेशान हुए इत्मीनान से मुझे सबकुछ समझाते गई । आखिर में हम किसी थ्री डी फिल्म का शो देखने गए। चश्मा लगाते ही मैं घबरा जाता था। हालात ये थे कि फिल्म के अंत होने तक मैं उसका हाथ जकड़े रहा और वह मुझे थ्री डी का मतलब समझाते रही।
क्लास में वह मेरी दोस्त, बड़ी बहन, सुरक्षा कवच सबकुछ वही थी। Hi की मीनिंग से लेकर रोज पहली मुलाकात में दोस्तों से हाथ मिलाने के रिवाज तक। यूं कहे दिल्ली की संस्कृति से मुझे रू-ब-रू कराई। दिल्ली में खासकर दिल्ली वाले बेहद कम लोग हैं मेरे जीवन में। गुरविंदर का ताउम्र कर्जदार रहूंगा।
हैप्पी रक्षाबंधन बहन।
![]() |
| कॉलेज के एक कार्यक्रम में मैं और गुरविंदर |
हमारी कामयाबी हर उस इंसान का कर्जदार है जो जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर हमारी दुरुह राह को आसान बनाने में साथ खड़े रहे हैं। हमें सहूलियत देकर आसानी से हमारी जिंदगी से निकल जाते हैं। गुरविंदर कौर। अब अपने नाम के आगे मल्होत्रा भी वो लगाने लगी हैं। मेरे जीवन की एक ऐसी ही इंसान है।
जितनी बिंदास उतनी ही बोल्ड। हमेशा चेहरे पर एक एक मीठी सी मुस्कान। जितनी खूबसूरत वह बाहर से दिखती हैं दिल की उतनी ही सुंदर। इंटरनेशनल इंस्टीट्युट ऑफ मीडिया मैनेजमेंट एंड आईटी (ईमी) में एक फरिश्ते की तरह मुझे मिली थी। उम्र में मुझसे थोड़ी बड़ी ही होगी। मैंने कभी उसे बहन कहा नहीं, लेकिन जबतक कॉलेज में साथ रही एक छोटे भाई की तरह ही मेरा ख्याल रखी।
बात 2011 की है। गांव की शांत गलियों से निकलकर मैं महानगर के भागदौड़ में शामिल हो गया था। कॉलेज में एक सप्ताह बीत गए थे। शहर वाले दोस्तों के साथ घुलने-मिलने की प्रक्रिया चल रही थी। श्वेता, गुरविंदर, स्वपनेश, छाया के साथ हमारा समूह पनप रहा था।
उस रोज क्लास खत्म होने के बाद हमलोग जीटीवी नगर मेट्रो स्टेशन पर मेट्रो का इंतजार कर रहे थे। तभी किसी ने कहा चलो हमलोग किसी मॉल में घूमने चलते हैं। सभी की राय ली जा रही थी। मॉल जैसे शब्द से मेरा पहली बार वास्ता पड़ा था। बिना सोचे-समझे मैंने अपनी सहमति जरूर दे दी थी लेकिन अंदर से व्याकुल हो गया था।
उसी व्याकुलता में मैंने गुरविंदर को एकांत में लेजाकर पूछा ये मॉल क्या होता है ?
हैरानी भरी निगाहों से मुझे निहारते हुए उसने कहा, तुम मॉल नहीं जानते !
उसे कैसे बताता कि बरबीघा के इस लड़के के लिए तब शहर की सबसे बड़ी दुकान कपड़े में भीखा राम छापड़िया की और किराने में रंजन किराना ही थी।
गुरविंदर जाने से मना कर चुकी थी, लेकिन मेरी बात सुनने के बाद वह भी तुरंत चलने को राजी हो गई। हमलोग निर्माण विहार स्थित वीथ्रीएस मॉल गए। मेरे लिए सबकुछ अचंभित करने जैसा था। 19 वर्ष की उम्र में पहली बार मैं इस तरह के किसी आलीशान शॉपिंग कांप्लेक्स की आंगन में खड़ा था।
गुरविंदर मेरा हाथ पकड़ मुझे मॉल का एक-एक कोना घुमाई। मैं वहां की हर एक चीज को अबोध बालक की तरह पूछते गया। वह बिना परेशान हुए इत्मीनान से मुझे सबकुछ समझाते गई । आखिर में हम किसी थ्री डी फिल्म का शो देखने गए। चश्मा लगाते ही मैं घबरा जाता था। हालात ये थे कि फिल्म के अंत होने तक मैं उसका हाथ जकड़े रहा और वह मुझे थ्री डी का मतलब समझाते रही।
![]() |
| कॉलेज की फ्रेशर्स पार्टी थी। तब पहली बार हम खूब डांस किये थे। |
क्लास में वह मेरी दोस्त, बड़ी बहन, सुरक्षा कवच सबकुछ वही थी। Hi की मीनिंग से लेकर रोज पहली मुलाकात में दोस्तों से हाथ मिलाने के रिवाज तक। यूं कहे दिल्ली की संस्कृति से मुझे रू-ब-रू कराई। दिल्ली में खासकर दिल्ली वाले बेहद कम लोग हैं मेरे जीवन में। गुरविंदर का ताउम्र कर्जदार रहूंगा।
हैप्पी रक्षाबंधन बहन।


Comments
Post a Comment