पापा का बायपास


                                             वार्ड नंबर 2702 का बेड नंबर एच

तारिख 10 जुलाई  2019। दिन बुधवार। मान-मनव्वल के बाद आखिरकार पापा इलाज के लिए तैयार हो ही गए। कोलकाता के कार्डियक सर्जन ललित कपूर से पापा का बायपास कराना तय हुआ । कार्डियक सर्जरी में इनके नाम की खूब चर्चा है। ऑफिस के कई सहयोगियों के संबंधियों को इन्होंने स्वस्थ किया है। कुछ तो इन्हें पूर्वी भारत का सबसे बड़ा कार्डियक सर्जन भी बताते हैं। मुकुंदपुर स्थित रबींद्रनाथ टैगोर कार्डियक साइंस हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर यहीं वो बैठा करते हैं। बुधवार की सुबह पापा का इनके साथ अप्वाइंटमेंट था। रिपोर्ट देखते ही इन्होंने बायपास की सलाह दी। जैसा कि पहले से ही ज्ञात था। उनके सलाह के साथ ही शुरू हो गई पापा को एडमिट करने की प्रक्रिया।
                                                 
रांची में डॉ. ललित कपूर के साथा पापा। ऑपरेशन के बाद ये पापा का पहला चेक अप था।

शाम के पांच बजे तक पापा तीन बार रो चुके थे। उन्हें इस बात की चिंता खाये जा रही थी कि उनके बेटे की गाढ़ी कमाई उनके इलाज में खर्च हो जाएगा। अगर यह बचता तो कोई दूसरा काम भी हो सकता था। घबराए हुए तो हम दोनों भाई (भैया जी) भी थे, लेकिन हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं था। ऑपरेशन ही एकमात्र विकल्प बच गया था। उन्हें फिर से स्वस्थ्य करना अब हमारा लक्ष्य था।
                                                    
एडमिट होने से पहले पापा। 

अस्पताल के सातवें माले पर वार्ड नंबर 2702 का बेड नंबर H पापा को फिलहाल दिया गया था। शुरुआती दो घंटे हम जितना भी देख पाए स्टाफ पापा का सही से ख्याल रख रहे थे। अगले 10 दिनों तक पापा को सफेद रंग की इस विशालकाय इमारत में इन्हीं लोगों की निगरानी में रहना था। छह बजे तक हम दोनों भाइयों को वहां से निकाल दिया गया। हमने अस्पताल के पास में ही एक कमरा किराए पर ले लिया। 


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                            कापते हाथों से अस्पताल के दस्तावेज पर साइन किया

तारिख 11 जुलाई 2019। दिन गुरुवार । आप थोड़ा बाहर आइएगा। पापा के पास से हटाते हुए डॉ. नीरज ने मुझसे कहा।  तब तक ऑपरेशन के पहले की एतिहाहती सारी जांच रिपोर्ट आ चुकी थी। नीरज इसका अध्ययन भी कर लिए। मरे बाहर आते ही उन्होंने कहा, आपके पापा के दिमाग में जाने वाली एक नली में भी ब्लॉकेज है। इसलिए ऑपरेशन के दौरान स्ट्रॉक का भी डर रहेगा। ज्यादा नशा करने के कराण इनके लंग्स में भी प्रॉब्लम है। बेहोश करने की प्रक्रिया में इन्हें ओवरडोज़ दिया जाएगा। इसका असर ये होगा कि होश में आने में इन्हें 2-3 घंटे का अतिरिक्त  समय लग सकता है। होश में आने के बाद जब तक दवा का असर रहेगा, कॉन्स्टिपेशन कि शिकायत भी रहेगी।
                          
ऑपरेशन की पूर्व संध्या पापा को भी कई जगह दस्तखत करना था। 

डॉक्टर नीरज एक के बाद एक मेडिकल टर्म में समस्याएं गिनाते जा रहे थे। मेरे माथे पर चिंता की लकीरें गहराने लगी थी। एक पिता जो अभी-अभी मुझसे सही से बात कर रहे हैं वह कल सुबह अपनी सबसे बड़ी बीमारी और जीवन से जूझ रहे होंगे। वे अपनी बातें कह कर निकल गए। अपनी डबडबाई आखों को पापा से छुपाने क लिए मैं उनसे नजर भी नहीं मिला पा रहा था।

इससे पहले पापा की सारी रिपोर्ट्स आ गयी थी। खून की जांच से लेकर पाप के पिशाब के नमूने तक को जांचा गया था । दिमाग के नस से लेकर तलबे की धमनियों में मशीन लगाकर वहां बहने वाले रक्त की जांच हुई थी। बीपी से लेकर शुगर और ईसीजी सब जांच पूरे कर लिए गए थे।तकरीबन सभी जांच नार्मल थे। इसी के आधार पर शुक्रवार सुबह पापा के ऑपरेशन का निर्णय लिया गया है। सुबह 7.30 बजे का समय निर्धारित हुआ। अपने कांपते हाथों से मैंने ऑपरेशन से पहले जरूरी दस्तावेज पर साइन किया।

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                                             आपके पापा का ऑपरेशन सफल रहा

तारिख 12 जुलाई 2019। दिन शुक्रवार। उस रोज का पहला ऑपरेशन पापा का ही होना था। हमदोनों भाई सुबह सात बजे ही अस्पताल पहुंच गए थे। नर्स पापा को पूरी तरह तैयार कर ली थीं। उन्हें सातवें माले से तीसरे माले स्थित ओटी में लाया गया। सभी डॉक्टर पहुंच गए थे। पापा के साथ हम दोनों की धड़कनें भी तेज थीं। पापा को उस समय मम्मी की अनुपस्थिति खल रही थी।

 वहां अन्य मरीजों के सात उनके परिजन भी थीं। हर किसी के साथ एक महिला जरूर थी लेकिन पापा के साथ केवल हम दो भाई थे। पापा सहमी निगाहों से हमें देखते रहे और सिस्टर उन्हें लेकर ओटी में चली गईं।
ओटी में जाते पापा।


लगभग 6 घंटे तक पापा की सर्जरी की प्रक्रिया चली। सुबह 8.30 बजे से ऑपरेशन शुरू हुआ। दोपहर 2 बजे अस्पताल से एक महिला ने प्यारी आवाज में फोन कर बताया कि आपके पापा के ऑपरेशन की प्रक्रिया पूरी कर ली गयी है। डॉ. ललित कपूर की अगुआई में, डॉ. नीरज, डॉ. देवराज और डॉ. राकेश ऑपरेशन की टीम में शामिल थे। ऑपरेशन के बाद ललित कपूर और डॉ. नीरज दोनों ने ऑपरेशन को सफल बताया है।

 अब तक फिल्मों में देखा था। सिर से लेकर पैर तक पाइप से बीना इंसान बेसुध बेड पर लेटा रहता है। परिजन कमरे से दूर शीशे की खिड़कियों से उसे देख निराश लौट जाते हैं। आज वह सीन हमारे जीवन में चित्रित था। दोपहर 2.20 बजे पापा को ऑपरेशन थियेटर से आईटीयू-7 में शिफ्ट किया गया। पापा के शिफ्ट होते ही हमदोनों भाई भी वहां पहुंचे। वे अभी भी बेहोशी की अवस्था में थे। सिर से लेकर पांव तक में अलग-अलग नलिका लगी थी। देखने के लिए भी साहस जुटाना पड़ रहा था। वहां  डॉ. ने बताया पापा वेंटिलेटर पर हैं। आठ घ्टे बाद होश में आएंगे।

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                                                          मैं बिलकुल ठीक हूं

तारिख 13 जुलाई 2019। दिन शनिवार। सुबह- सुबह फोन की घंटी बजी। फोन हॉस्पिल से आया था। आप राजेश कुमार के संबंधी बोल रहे हैं। सुनिए, पेसेंट होश में आ गए हैं। वह अभी बिल्कुल ठीक हैं। आप आकर उनसे मिल सकते हैं। हॉस्पिटल के नियमानुसार मैंने फोन करने वाले से पूछा क्या मुझे अभी पापा के पास आने के लिए मिल सकता है। उन्होंने कहा, हां आप स्पेशल पास लेकर आ सकते हैं। उधर से आवाज आई थी।

दोनों भाई भागते हुए हॉसपिटल पहुंचे थे। स्पेशल पर्ची कटाया और भागते हुए छठे माले पर पहुंचा। जहां आईटीयू में पापा  भर्ती थे। पापा अभी भी वैसे ही लेटे थे, जैसा कल शाम में छोड़ कर गए थे। मुझे घबराया देख गार्ड दीदी बोलीं पेशेंट को हिलाने बोलूं? पापा के हाथ से लेकर दिमाग तक के नस में पाइप की नाली लगी थी। मुझे देख पापा हाथ हिलाने लगे। वहीं से चिल्लाते हुए बोले बिल्कुल ठीक हूँ। मैं घबरा गया कि उनका कोई पाइप हिल न जाये। पापा की उस आवाज के साथ मेरी सारी खुशियां लौट आई थी। आखिरी बार इतनी संतुष्ट हंसी कब आई थी मुझे सही-सही याद नहीं। 
       

मुलाकाती की बेला शाम 4-5 के बीच का था। तब तक हम दोनों भाई मां दक्षिणेश्वरी का दर्शन कर लौट आये थे। पहले भैया जी फिर मै। बारी-बारी से पापा से मिलने गए। प्रक्रिया एकदम जेल टाइप है। पापा अब रियेक्ट करने लगे थे। वे हमें देख कर पहले मुस्कुराए फिर डॉ. को हमें अंदर बुलाने का इशारा किये, लेकिन ये हमें भी पता था और डॉ. को भी की वो अभी आईटीयू में हैं। उनके पास मेडिकल टीम के अलावा कोई नही रह सकता।
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                                        उस रोज पापा को पहली बार डांटा था

तारिख 14 जुलाई 2019। दिन रविवार। कल सुबह की तरह आज भी अस्पताल से एक फोन आया। लेकिन इस बार कल वाली तसल्ली नहीं थी। एक घबराहट थी। जिसे सुनते ही भैया जी के चेहरे पर भी बेचैनी तैर गयी। आज फोन उन्हीं के नंबर पर आया था। फोन सुनते ही उन्होंने कहा, शम्भू अस्पताल चलना होगा। पापा दवाई नहीं लहै रहे हैं। हम दोनों भाई अस्पताल की ओर दौड़े।

वहां पापा एक अलग रूप में ही थे। पापा को आईटीयू से बाहर निकाल कर दूसरे कमरे में लाया गया था। वे परेशान थे। कुछ से कुछ बोले जा रहे थे। कभी डॉ. को चोर तो कभी अस्पताल को जलाने की बात कर रहे हैं। कभी गांव के कुछ लोगों का नाम ले रहे थे। कभी खुद को पीटने के बारे में बता रहे थे। एकदम सहमे हुए थे। शरीर में लगे सभी उपकरण को नोचने के लिए आतुर थे। वहां के नर्सिंग स्टाफ पापा की इस हरकत से इतने तंग आ गए थे। उनके हाथ पांव को बांधने की नौबत आ गई थी।
जब पापा नॉर्मल होने लगे थे।


हमारा समझाना बेकार रहा। भैया जी काफी सॉफ्ट ही रहे । मैं जानता था कि ये स्थिति होने वाली है। मैंने पुत्र वाला मोह छो कर जीवन में पहली बार पापा से उंची आवाज में बात की । उहन्हें फटकारा। वे चंद मिनट शांत रहे लेकिन अगले  कुछ घंटे परेशान ही रहे। डॉ नीरज अपनी टीम मेंबर्स के साथ आये। उन्होंने बताया कि ये इनकी नशे की आदत के कारण है।

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                                     पाइप से मुक्ति के लिए पापा की कुलबुलाहट

तारिख 15 जुलाई। दिन-सोमवार। सुबह के सात बजने में अभी कुछ मिनट बाकी थे, जब मैं हॉस्पिटल के छठे माले स्थित आईसीयू पहुंचा था। नींद से भरी आंखों में भैया जी पापा के पास बैठे थे। देखते ही पापा बोले। लो अब यह आ गया न। देखना थोड़ा सा हिलेंगे नहीं कि चिल्लायेगा। जबकि रात में हैम 2 हज़ार बार हिल चुके हैं। पापा के इस डर भारी बातों से हम सब एक साथ मुस्कुरा दिए। वह नर्सिंग स्टाफ जो रात भर पापा के साथ जगा था। भैया जी अब जा चुके थे और उनकी जगह मैंने ले ली थी।

आज सुबह से ही पापा को बेचैनी है कि कब उन्हें दूसरे वार्ड में शिफ्ट किया जाएगा। कब उन्हें दूसरों की तरह कुर्सी पर बिठाया जाएगा। कब वह टहलेंगे। कब पिशाब की थैली को उनके शरीर से अलग किया जाएगा। 1 घंटे में 50 बार वह मुझसे पूछ चुके थे। मेरे जवाब से असंतुष्ट होकर वह नर्स या नर्सिंग स्टाफ से पूछने लगते। एक कुलबुलाहट सी है उनके अंदर।


थोड़ी देर बाद उनके पास एक डॉ. आये।उनका चप्पल निकाल गया। उस डॉ. ने अपना सहारा देकर पापा को उस वार्ड का एक चक्कर लगवाया। पापा का चेहरा बता रहा था जैसे उनका सारा गम दूर हो गया हो।हालांकि एक चक्कर के बाद डॉ. ने  उन्हें  उनके बेड के पास रखी काठ की ऊंची कुर्सी पर बिठा दिया।  इस हिदायत के सथि कि अभी पहला दिन था। इतना ही काफी है। 

 नौ बजे के बाद डॉ. का आना शुरू हो गया।सभी बारी बारी से पापा का इम्प्रूवमेंट चेक कर रहे थे। उन्हें दूसरे वार्ड में शिफ्ट करने की बात कर रहे थे। पापा को ये बातें सुन कर अच्छा लग रहा था। इतने में डॉ. नीरज आए।  उन्होंने पापा को देखा। हमारी उनसे बात हुई। उन्हीने बताया की हार्ट को सपोर्ट करने वाली दवा बंद कर दी गयी है। कुछ सिमटम चेक किये जा रहे हैं। सबकुछ सही रहा तब आज नही तो कल अलग वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाएगा।
  
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                                          पापा के चेहरे की वो खुशी

तारिख 16 जुलाई। दिन-मंगलवार। सुबह से ही कान फोन की तरफ था। पापा को दूसरे वार्ड में शिफ्ट किया जा चुका था। शरीर से सभी पाइप भी ह गए थे। पापा अब मशीन की जगह  अपने बूते खड़े हो गए थे। क्रिटिकल की जगह एक सामान्य पेशेंट बन गए थे। डर लगा हुआ था। सब कुछ सही हो रहा या नहीं। लगभग 1 बजे भैयाजी के नंबर पर फोन आया। यह बताने के लिए कि पापा को जेनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। उसी वार्ड में जहां से पापा को ऑपरेशन के लिए ओटी ले जाया गया था। राहत मिली।

5 बज गया। हम दोनों भाई अस्पताल की ओर निकल गए। में आई हेल्प यू डेस्क से पता चला पापा को वार्ड नंबर 2701 के बेड नंबर सी पर रख गया है। पहले भैया जी गए। मैं बाहर उनके और सुगंधा का इंतजार करता रहा। पहले सुगंधा आई। इसके बाद 5.40 तक भैया जी भी वापस आ गए। भैया जी जब नीचे आये तो बहुत एक्साइटेड थे। बोले शम्भू चलो डॉ. के पीए से मिलना है। कल पापा को रिलीव कर दिया जाएगा । मै घबरा गया। अरे 10 दिन से पहले कैसे छोड़ देंगे। उन्होंने बताया कि अब पाप को बस सात दिन तक ड्रेसिंग कराना होगा। इसके लिए यहां बाहर रुकने बोल रहे। इससे बढिया है कि हम रांची में ही ड्रेसिंग करा लें। चलो न वो डॉ. के सेक्रेटरी से बात करने बोले हैं। 

डॉ. कपूर की टीम ने भी हमारे आईडिया पर मुहर लगा दी। सब कुछ कर में पापा के पास पहुंचा। पापा आज किसी भी बात से ज्यादा खुश इस बात से थे कि वो कल यहां से विदा ले लेंगे।वह कुछ और बात करने के लिए तैयार नहीं थे। हर बात की अंत बाहर जाने के बात पर ही होती थी। तसल्ली के लिए मैंने भी सिस्टर से पूछा। उन्होंने यही बोला। और अगले दिन हम क्रियायोग एक्स्प्पेरस से रांची लौट गए।
             
सुगंधा के साथ पापा। बेटी से मिलने से ज्यादा खुशी डिस्चार्ज होने की थी



हॉस्पिटल जाते  वक्त चेहरे पर जो गम और उदासी थी वह अब खुशी में तब्दील हो गई थी। ये खुशी मुझे एक साथ कई जिम्मेदारी दे गई थी। अभी तक लापरवाह रहे शंभू को जिम्मेदार बना गया था। एक सप्ताह की यह यात्रा अपने पिता के प्रति प्रेम को गहरा और घना कर गया। 

Comments

  1. आपके पापा बहुत भाग्यशाली हैं कि आप उनके पुत्र हैं।

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