59 दिन बाद रांची में कोरना के प्रसार को रोकने के लिए बना सबसे बड़ा कंटेनमेंट जोन अब सीलमुक्त है। हिन्दपीढ़ी की लगभग 70 फीसदी आवादी सामान्य रांचीवासियों की तरह घूम सकती है। लगभग डेढ़ दर्जन मिनी कंटेनमेंट जोन को पहले ही फ्री किया जा चुका है। आठ से 10 छोटे-छोटे कंटेनमेंट जोन अब शहर में बच गए होंगे। 28 मई तक रांची में फिलहाल कुल 127 पॉजिटिव केस में 24 कोरोना पॉजिटिव केस एक्टिव रह गए हैं। इनमें से 21 बाहर के राज्यों से रांची आने वाले श्रमिकों का है।
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| लॉकडाउन में यह हमेशा गुलजार रहने वाले फिरायलाल का दृश्य है। |
रेड से ऑरेंज जोन में जाने वाली रांची के संघर्ष की कहानी कहती है कि लड़ती है रांची। जिस शहर के पास मानक के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में पीपीई किट नहीं थे। सेनिटाइजर नहीं था। मास्क तक के लिए लोगों को भटकना पड़ गया था। वह शहर जांच से लेकर मरीजों की रिकवरी के मामले में देश के श्रेष्ठ शहरों में शामिल है। यहां अभी तक कोरोना से कुल जमा दो मरीजों की मौत हुई।
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| अरविंद मिल्स की मदद से रांची में ही 250 रुपए की खर्च में पीपीई किट तैयार किया गया है। |
पहले यह जान लिजिए कि 60 दिनों में रांची के पास कोरोना से लड़ने के लिए क्या-क्या है। द साउथ इंडियन टेक्सटाइल रीसर्च एसोसिएशन से अप्रूव्ड लगभग 15 हजार पीपीई किट तैयारावस्था में है। इनमें सात हजार यहां के सिविल सर्जन को इस्तेमाल के लिए सौंपा जा चुका है। एक किट को तैयार करने की कुल लागत मात्र 250 रुपए है। एक लाख लीटर सेनिटाइजर यहां के स्वयं सहायता ग्रुप की दीदी की मदद से तैयार कराया गया है। लगभग एक लाख मास्क भी बंटने की प्रक्रिया में है।
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| सीएम किचन की मदद से पिछले 50 दिनों से औसतन रोज 6 हजार लोगों को खाना खिलाया जा रहा है। |
मुंबई और उड़ीसा के बाद रांची पहला ऐसा शहर था जहां कोविड हॉस्पिटल तैयार था। अभी इस शहर में तीन कोविड हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। पांच इलाज के लिए वेटिंग मोड़ में हैं। सुधार के स्ट्राइक रेट के मुताबिक शायद उसकी जरूरत भी न पड़े। इसके अलावा यहां दो अस्पतालों में कोविड-19 की जांच की व्यस्था की गई है। जहां औसतन 400 सैंपल की जांच रोज की जा रही है। इसमें रांची के अलावा आस पड़ोस के एक दर्जन जिले के भी सैंपल शामिल हैं। रांची सदर अस्पताल राज्य का पहला ऐसा आस्पताल है जहां ट्रू-नेट मशीन में जरूरी तब्दिली के साथ कोविड-19 की प्राथमिक जांच की जा रही है।
इन तैयारियों के साथ भी अगर आप जिला प्रसासन के अधिकारियों से बात कीजिएगा। तब आपको एक जवाब मिलेगा कि हम सब लगभग हार चुके थे। 26, 27 और 28 अप्रैल को पॉजिटिव मरीजों की रफ्तार के बाद लगने लगा था कि अब संभव नहीं है इसे संभाल पाना। उनके लिए एक बड़ी चुनौती हिन्दपीढ़ी का लार्ज कंटेनमेंट जो में तब्दील होते जाना था। अधिकारियों के मुताबिक आप इसे छोटा धारावी भी समझ सकते हैं। अधिकारी कहते हैं कि अब तक सुना था कि चुनौतियों से हारती नहीं लड़ती है रांची। इस विकट काल में यह देखा नहीं महसूस किया।
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| नीले शर्ट और पैंट में रांची के एसडीओ हैं। कानून व्यवस्था कैसे बेहतर रखा जा सकता है इन्होंने इसमें अपना कौशल बखूबी दिखाया है। |
जिला प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक लगभग दो हजार वॉलेंटियर्स हर रोज 50 हजार घरों तक पहुंच रहे थे। ये जरूरतमंदों को चिन्हित करने से लेकर उन तक मदद पहुंचाने तक की पूरी प्रक्रिया का मोर्चा खुद संभाल रहे थे। लगभग डेढ़ दर्जन संगठन पिछले 50 दिनों से चप्पल से लेकर ब्रश तक की मदद प्रशासन को कर रहे हैं। कई तो ऐसे हैं जिन्होंने अपना नाम तक लिखवाना मुनासिब नहीं समझा है। अब इस विपरित समय में रांची के संघर्ष के इस जीत का सेहरा आप यहां के जिला प्रशासन के सिर बांधिए। या फिर प्रशासन के मुताबिक रांचीवासियों के सिर। इसे तय करने के लिए आप आजाद हैं, लेकिन हां कोरोना ने एक बार जरूर साबित किया है कि लड़ती है रांची।
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| ये टीम रांची है। |
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