ये आधुनिक बिहार के स्कूल हैं; जहां भविष्य संवर रहे

घुप्प अंधेरा कमरा, टूटे बेंच...कमरे के पिछले हिस्से में रखा सड़ा गद्दा... टूटे टेबल के साथ धूल फांकते कबाड़ के समान... पहली नजर में लगा किसी कबाड़ रूम में आ गया हूं। धूल से खुद को संभाल पाता कि सहसा बच्चों की शोर ने बताया मैं क्लास रूम में हूं। बच्चों ने बताया इसी कमरे में तीसरी और चौथी कक्षा के बच्चों की पढ़ाई होती है। 

ये किसी कबाड़ रूम का नहीं पटना के एक क्लास रूम की तस्वीर है। इन्हीं के बीच तीसरी और चौथी कक्षा की क्लास संचालित होती है। 

यहां बच्चे अपने शिक्षक की राह देख रहे थे। जो अगले एक महीने तक उन्हें पढ़ाने की जगह जाति गिनने में व्यस्त रहेंगे।हम जाति आधारित गणना की घोषणा के बाद स्कूलों में पढ़ाई की स्थिति जानने गए थे। आधुनिक बिहार के निर्माता के काल में राजधानी के स्कूलों की ये स्थिति मिलेगी इसका अंदाजा नहीं था।  

ग्रामीण इलाकों वाले जिलों से गाहे-बगाहे स्कूल के डूब जाने, बिना रास्ते वाले स्कूल और पेड़ के नीचे चलने वाले स्कूल की सूचना आते रहती है लेकिन इस रिपोर्ट को तैयार करते हुए कई हैरान कर देने वाली जानकारी मिली।  

बच्चे शिक्षक की राह देख रहे हैं लेकिन वे अगले एक महीने तक यहां नहीं आएंंगे। पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है जाति की गणना। 

पटना के बीच शहर में एक कैंपस में चार-चार स्कूल संचालित होते हैं। इसमें दो बालिका विद्यालय हैं और दो बालक के। अब इसे काहे का बालिका विद्यालय कहें, इस समस्या में उलझें उससे इतर परेशानी ये जान लीजिए स्कूल प्रार्थना कराने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं। इसके बाद की समस्या तो जो है सो हइये है। परंतु ये समस्या एक ही स्कूल तक सीमित नहीं है पटना के कई स्कूल इसी हालात में चल रहे हैं। 


एक तरफ जहां बिहार को आधुनिक बनाने के लिए ताबड़-तोड़ भवनों के निर्माण कराए जा रहे हैं। विधायक आवास से लेकर मंत्री निवास तक हर भवन को आधुनिक किया जा रहा है, लेकिन जहां से आधुनिक बिहार का भविष्य संवरेगा वर्षों से उसकी सुध लेने का होश हमारे हुक्मरान को नहीं है। 


बाकी इन दिनों बिहार में अभी शिक्षक नियुक्ति नियमावली पर बवाल है... 

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