ईमी डायरी - 2, शंभू तुम तो 'HI' करना भी नहीं जानते !

कॉलेज में मेरा तीसरा दिन था। धीरे-धीरे लोग एक-दूसरे से घुलने-मिलने लगे थें। कुछ लोगों से मेरी भी बातें होने लगी थी। उस दिन भी मैं अपने तय समय से कॉलेज पहुंचा। कुछ मित्र पहले से ही वहां मौजूद थें। मैं अभी अपना बैग रखा ही था कि छाया अपना दायां हाथ बढ़ाकर मुझसे दो बार बोली हाय… हाय शंभू… मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि छाया क्या कह रही है? जब तक कुछ समझ पाता छाया उदास होकर मेरे पीठ पर हौले से मारकर यह बोलते हुए आगे निकल गई कि “शंभू तुम् तो हाय करना भी नहीं जानते”। लो अब मेरे लिए एक और नई मुसिबत, अब ये “हाय” क्या बला है?
अब बताइए प्योर ग्रामीण परिवेश में जीने वाला शंभू कहां से जानता कि हाय क्या होता है? हाय बोलने पर हैलो भी कहना होता है? अब सोचिए जरा जो, यह तक नहीं जानता हो कि हाय और हैलो किस चीडियां का नाम है? वह भला उस वक्त छाया को हैलो का रिप्लाय कहां से कर पाता?

मैं अपनी पेशानी पर बार-बार जोर देकर यह समझने का प्रयास कर रहा था कि जब छाया मुझसे मिली तब वह मुस्कुरा रही थी, आखिर मुझसे क्या गलती हो गई कि वह जाते वक्त मुझसे नाराज हो गई। इतना कि पीठ पर एक हल्की सी थपकी भी दे गई। उस बेचैनी के काल में कई बार दिमाग में ख्याल आया कि छाया से ही पूछ लूं कि कहीं कोई गलती हो गई क्या मुझसे? लेकिन हिम्मत कहां से जुटाता। बस यूं ही परेशान सोचता रहा। कि इतने में गुरविन्दर कि नजर मेरे उपर पड़ी। क्या हुआ शंभू क्यों परेशान हो? गुरविन्दर से मेरा परिचय पहले ही दिन हो गया था। गुरविन्दर जब तक कॉलेज में रही मेरी एक बड़ी बहन के रूप में रही। वो मेरी हर समस्या का समाधान मुझे बताती रही। शरुआती दिनों में दिल्ली के कल्चर से मुझे गुरविन्दर ने ही अवगत कराया। न केवल समझने में बल्कि मेरे खातिर वह क्लास में कभी-कभी कईयों को डांट भी देती थी।

ऐसे ही एक बार अंजली मुझे अपनी सीट से पीछे जाने को कही, और मैं चुपचाप अपना बैग उठाया और पीछे चला गया। गुरविन्दर उसी वक्त आंख दिखाते हुए नहीं जाने का ईशारा की, लेकिन मैं चला गया। सर के निकलते ही मुझे डांटते हुए बोली क्यों गया पीछे? मैने बोला अंजली बोल रही थी कि उसे अपने दोस्त के साथ बैठना था। इस पर वह गुस्से भरे लहजे में बोली कल मैं तुम्हें क्लास बाहर जाने को बोलूंगी तुम बाहर चले जाओगे? तुम पहले आये थे, जहां चाहो बैठो।                     
उस दिन भी मेरी परेशानी उस से नहीं देखी गई और बड़े प्यार से मेरे परेशान होने का कारण पुछी। मैंने अपनी पूरी ब्यथा अपनी बहन को सुनाया। पहले तो वह बड़ी तेज हंसी। किसी तरह हंसी को कंट्रोल करते हुए बोली बस इतनी सी बात पर तुम इतने परेशान हो रहे हो। मेरी घबराहट और तेज हो गई, बताओ न गुरविन्दर मैने कुछ गलत तो नहीं किया न। पागल तुमने कुछ भी गलत नहीं किया। हां बस तुम्हें हैलो बोलना चाहिए था, जो तुमने नहीं बोला।

 ये क्या होता? मैं एक आश्चर्य भरे लहजे में पूछा!
वह बड़े प्यार से समझाते हुए बोली, जब हम दिन में पहली दफा किसी से मिलते हैं न तो एक दूसरे से हाय और हलो करते हैं। और एक दूसरे का हाल जानते हैं। मन करे तो हांथ भी मिला लेते हैं या फिर गले भी लगते हैं।
समझे बुद्धु?
मैंने धीरे से बोला हां।
वह बोली तुम सच में बहुत भोले हो।

तब जाकर मेरे दिल को थोड़ा सुकून मिला। और फिर मैंने छाया से जाकर बोला, छाया वो मुझे नहीं पता था। दिल्ली के शुरुआती दिनों में ऐसी कई रोचक घटनाएं मेरे साथ घटी। इस देहाती की ऐसी ही और घटनाएं अगली कड़ी में।

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