ईमी डायरी-1



किसी भी चीज के आगे जब पहला शब्द जुट जाता है, तो वह हर व्यक्ति के लिए अनमोल और यादगार बन जाता है। वो हर उस चीज, उस दिन, उस लम्हे को  को सहेज और समेट कर ताउम्र के लिए याद रूपी बक्से में लॉक कर लेना चाहता है ताकि वह कभी भी उससे गुम न हो पाए। ऐसी ही यादों में से एक है, मेरा इन्टरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मीडिया मैनेजमेंट एंड आईटी (IIMMI) का पहला दिन।
           मुझे यह कहते हुए कोइ गुरेज नहीं है कि यह दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वांइट था। यह वो दिन था जहां एक देहाती का शहरी जीवन से वास्ता पड़ा था। मेरे अंधकारमय जीवन में दो प्रकाशपुंज इसी दिन मिले थे, जिन्होनें मेरे जीवन की दशा और दिशा बदल दी।
25 अगस्त 2011 की वह सुबह मेरे हर सुबह से बिलकुल जुदा थी। मेरे अंदर का उमंग और उत्साह अपने चरम पर था। आखिर होता भी क्यों न कभी जिसके ख्वाब संजोया करता था, वो आज पूरा होने वाला था।
      मैं और राकेश भैया (भैया जी के दोस्त) कॉलेज की टाइमिंग से तीन घंटे पहले ही कमरे से निकल गए। क्योंकि कॉलेज की राह मेरे लिए तो अनजान थी ही वे भी इससे अनभिज्ञ थे। तीव्र मुद्रिका सर्विस के लाल रंग की उस बस ने हमें 2.30 घंटे में जीटीवी नगर मेट्रो स्टेशन के पास उतारी । एक दो लोगों से पूछने के बाद हमें मेरा संस्थान मिल गया। पीले रंग की एक इमारत के दो मंजिल की यात्रा हरे रंग की सीढ़ियों पर पूरी करने के बाद हमलोग श्वेता मैम से मिले जो हमारी को-ऑर्डनेटर थी। उन्होंने मुझे तीसरी मंजिल पर स्थित मेरे भावी क्लास में पहुंचा दिया।

राकेश भैया भी मेरे पॉकेट में 500 का एक नोट रख कर मुझसे विदा ले लिए। मेरे दिल की धड़कनें अपने रफ्तार की चरम सीमा पर थी। सारी चीजें बिलकुल मेरे लिए अलहदा थी। पूरे कमरे को निहार लेने के बाद मैं कतार की सबसे अगली कुर्सी पर अभी बैठा ही था कि इतने में अचानक एक लड़की भी मेरे बगल में आकर बैठ गई। मैं घबरा कर बगल वाली कतार के एक कोने में चला गया। मैं भूल गया था कि यह मेरे गांव का SKR कॉलेज नहीं बल्कि महानगर का एक इंस्टिट्यूट है। यहां लड़के और लड़कियों के लिए अलग- अलग कतारें नहीं हुआ करती बल्कि सभी साथ बैठते हैं।

पहले से भयभीत मन को और डरा दिया स्मिता मैम के परिचय का नायाब तरीका। मैम दो लोगों को सबसे आगे बुलाकर किसी काल्पनिक जगह का लोकेशन दे कर आपस में बात करने के लिए बोल देती थी। इसी प्रक्रिया में जब मेरा नंबर आया तो मेरे साथ ललिता(जो अब पंजाब केसरी में संवाददाता है) को मैम आगे बुलाईं। उस पल मेरे अंदर क्या चल रहा था वो तो केवल मैं ही समझ पा रहा था। एक तो नई जगह उपर से लड़की। हलक से आवाज बाहर निकालने की बिलकुल ही हिम्मत नहीं हो रहा था, दोनों पैर कांप रहे थे।

खैर मैम के दो बार बुलाने के बाद किसी तरह हिम्मत जुटा कर मैं सामने गया, ललिता पहले ही पहुंच चुकी थी। मैम ने हमें लोकेशन दिया था डीटीसी (Delhi Transpor Corporation) बस स्टैंड और शाम का समय। डर के मारे मेरी बोलती बंद, नजरें झुकी, कान बस इस शब्द के इंतजार में कि मैम कब जाने को कहें। बात न बनता देख कुछ देर बाद हिम्मत जुटा कर थरथराती आवाज में मैने ललिता से पूछा,
'मैम आपको कहां जाना है?'
बिना देर किए जिस बेरूखी भरे लहजे में वह, बोली कि मैं आपको क्यों बताउं?
मेरे बटोरे सारे हिम्मत पर पानी फिर गया। जुबान पर बस चुप्पी टंग गई । कुछ देर की चुप्पी को तोड़ा मैम की आवाज ने, ‘जाइये अपनी सीट पर बैठ जाईए’।

शाम के तीन बजे क्लास समाप्त हुई और मैं अपनी ठिकाने पर वापस। किसी से भी बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। हां कुछ दोस्त ने मुझसे मेरा नाम जरूर पूछा था। उसकी कहानी अगली कड़ी में।

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