आज फिर उनकी याद आई..
मम्मी-पापा
आज जब दफ्तर से निकल रहा था तो आप लोगों की कमी मुझे बेहद खल रही थी। पापा आपको
याद है, जब
मैं किसी काम को करते-करते थक जाता था
तो आप किस कदर चिंतित और
परेशान हो जाते थे, अपने हांथों से पहले मेरा चेहरा सहलाते थे, फिर
एक प्यार भरे लहजे में कहा करते थे “काहे ले कैल्हीं एतना कामा, छोड़ देंथी हल” मां
तो उस दिन तब तक नहीं सो पाती थी जब तक मैं चैन से सो
नहीं जाता था। आप दोनों के इसी
प्यार के कारण एक किसान का बेटा होने के बाद भी आज तक मैं खेती का एक भी गुर नहीं सीख
पाया, आज भी बहुत कम फसल के बारे में जानता हूं।
लेकिन आज जब 12 घंटे दफ्तर
में बिताने के बाद घर निकल रहा हूं। शरीर का एक-एक अंग दर्द से कराह रहा है। फिर
भी मुस्कुरा रहा हूं। आखिर आज सुनाउं भी किसे हाल अपना। कहने को तो आज भी चारदिवारी
से घिरे अपने एक कमरे में जाउंगा,पर वहां मां नहीं मिलेगी जो मेरा थका चेहरा देख
कर परेशान हो उठेगी, और न ही वो मां के हाथ का वो हल्दी वाला दूध जिसे वो अपने
हांथों से पिलाती थी। वहां पापा भी नहीं होंगे जो प्यार से मेरा चेहरा सहलाएंगे।
और आपको फोन पर बताउंगा भी नहीं वर्ना आप बेचैन हो उठेंगे।
लेकिन जानते हैं इस थकान का अपना
एक अलग ही मजा है। आपके बेटे ने आज अपने सर के साथ मिलकर 24 पेज फायर किया है।
जिसे कल सारे दिल्ली एनसीआर वाले पढ़ेंगे।आप यह जानकर और खुश हो जायेंगे कि दिल्ली
वाले एडिशन के पहले ही पन्ने की स्टोरी आपके बेटे के नाम के साथ(Byline) गई है। पापा इस खुशी
के सामने यह थकान कुछ भी नहीं है। किन्तु आप घबराइएगा नहीं क्योंकी इतनी देर तक 15
दिन में एक ही दिन रुकना पड़ता है,जिस दिन मेरा एडिशन जाने वाला होता है
सर बता रहे हैं कि मैं धीरे-धीरे चीजें समझ रहा हूं, लेकिन अभी
मुझे बहुत सारी चीजों को सीखना है। अब सीखने की इस प्रक्रिया में थोड़ी थकान तो होगी
न। और ये मत भूलिए कि अब आपका बेटा नव भारत टाइम्स का एक एंप्लायी
है।
आपका
शंभू बाबू
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