नीतीश जी आप इसी तरह निश्चय करते रहिए
नीतीश कुमार अपने कुछ अचानक फैसले से अक्सर लोगों को अचरज में
डालते रहे हैं। चाहे वह लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के साथ 17 साल पुरानी दोस्ती को
अलविदा कहना हो या विधानसभा चुनाव से पहले धुरविरोधी लालू यादव के साथ गठबंधन का फैसला।
दिलचस्प बात यह है कि अपने फैसले को सही साबित करना भी वह बखूबी जानते हैं।
शराबबंदी का ऐसा ही एक फैसला दिसंबर 2015 में लेकर उन्होंने
सभी को हैरान कर दिया था। चुनाव के दौरान एक आशा कार्यकर्ता को किए अपने वादे को पूरा
करते हुए उन्होंने ऐलान किया कि वित्त वर्ष 2016 से बिहार में पूर्ण रूप से देसी शराब
पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। हालांकि दिसंबर में जब उन्होंने इस बात की घोषणा की थी
तो सभी ने नीतीश कुमार का मजाक उड़ाया था। कोई भी यह मानने को तैयार नहीं था कि जिन्होंने
बिहार में शराब की बिक्री को फर्श से अर्श पर पहुंचाया वही अब इस पर पाबंदी लगाने की
बात कर रहे हैं।
लेकिन अप्रैल की पहली तारीख से इन्होंने अपने वादे को पूरा करते
हुए न केवल देसी पर बैन लगाया बल्कि चार दिन के भीतर ही विदेशी पर भी बैन लगा कर बिहार
को पूर्ण रूप से एक ड्राई स्टेट घोषित कर दिया। राज्य में शराब पर न केवल प्रतिबंध
लगाया है बल्कि जिस तरह से इन्होंने शुरुआत में इस पर नकेल कसा है वह अपने-आप में इसके
प्रति उनकी सक्रियता को दिखाता है। अभी सप्ताह भर भी नहीं बीता है और प्रशासन ने राज्यभर
से करोड़ों रुपए के शराब को जब्त करके उसे नष्ट कर दिया है। इसके साथ ही गुजरात, नागालैंड
और केरल के बाद बिहार भी ड्राई स्टेट की कतार में शामिल हो गया है।
शौचालय से पहले मदिरालय
बीमारू राज्य का दर्जा प्राप्त हिन्दुस्तान के इस राज्य में
लोग सुबह नींद से जगने के बाद शौचालय से पहले मदिरालय जाना पसंद करते हैं। बिहारियों
के शराब प्रेम का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि ये हर साल 1410 लाख लीटर शराब
गटक जाते थे। इसमें जहां देसी की मात्रा 990.36 लाख लीटर होती है वहीं विदेशी 420 लाख
लीटर।
आधी से ज्यादा आबादी शराब के गिरफ्त में
इग्नू के छात्रों की ओर से किए गए एक रिसर्च की मानें तो बिहार
में 54 फीसदी से ज्यादा लोग शराब पीते हैं। इतना ही नहीं इस रिसर्च में यह भी सामने
आया है कि राज्यभर में 18-35 आयु-वर्ष के 65 फीसदी युवा किसी न किसी नशे की लत से पीडित
हैं। इसमें शराब, गांजा, भांग, चरस, कोकिन और यहां तक कि कफ-सिरप भी शामिल है। साथ
ही यहां की महिलाएं भी जाम छलकाने में पीछे नहीं हैं। रिसर्च के मुताबिक राज्य की
4 फीसदी से ज्यादा महिलाएं शराब का सेवन करती हैं।
नीतीश के गुरु भी आजमा चुके हैं यह नुस्खा
ऐसी बात नहीं है कि शराब से बर्बाद होते
राज्यवासियों की चिंता केवल नीतीश कुमार को ही हुई है। इससे पहले बिहार के पूर्व
मुख्यमंत्री और इनके राजनीतिक गुरु कर्पूरी ठाकुर भी 1977 में इस नुस्खे को आजमा
चुके हैं। लेकिन वह उस दौरान बिहारवासियों को मात्र डेढ़ वर्ष तक ही इस नशे से दूर
रखने में कामयमाब हो सके थे। डेढ़ साल बाद उन्हें पाबंदी हटाने के लिए मजबूर होना
पड़ा था।
नीतीश के शाषन काल में राशन से ज्यादा
शराब की दुकानें खुली
ऐसी बात नहीं है कि बिहार में 6 हजार शराब
की दूकानें एक साथ खुल गई। 2005 में नीतीश बाबू के सत्ता में आने से पहले यह
संख्या आधे से भी कम थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद इन्होंने जमकर देसी शराब के
लाइसेंस बांटे थे। नतीजा यह हुआ कि 10 साल के अंदर-अंदर बिहार के गांवों मे भले ही
राशन और दवा की दूकान न मिले लेकिन शराब का ठेका गली-गली में खुल गया था।
आंकड़ों पर एक नजर दौड़ाएं तो जिस शराब से
बिहार को 2005-6 तक 295 करोड़ का राजस्व मिल रहा था 2016 में वह 4 हजार करोड़ का
आंकड़ा छू लिया। इतना ही नहीं देशभर में जहां बियर के मार्केट में 10 फीसदी का
इजाफा हुआ तो बिहार में य़ह आकड़ा 30 फीसदी को पार कर गया।
मुश्किल है डगर
अब देखना दिलचस्प होगा कि एक ऐसे समय में
जब सातवां वेतन आयोग लागू होने वाला है, केंद्र से राज्य को मिलने वाले फंड में भी
कटौती होने वाली है। ऐसे में अपने राजस्व में 4 हजार करोड़ रुपए की कटौती को नीतीश
कुमार किस हद तक मैनेज कर पाते है। या फिर नीतीश कुमार भी अपने गुरु की तरह असफल
होकर अपना फैसला वापस लेने पर मजबूर हो जाएंगे।
बिहार में यह पूर्ण शराबबंदी कितने दिनों
तक चल पाएगा यह कह पाना तो फिलहाल मुश्किल है। लेकिन हां इसे लागू करने का् जो साहस
नीतीश कुमार ने दिखाया है वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है। इनके इस फैसले पर हम तो बस
इतना ही कहेंगे सर आप इसी तरह बिहार हित में निश्चय करते रहिए।






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